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गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563

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आज…. प्रेम किया है हमने….


‘‘जी! पण्डित जी!’’ देव ने एक बार फिर से सिर हिलाया।

‘‘आज के बाद अपने जीवन के सभी निर्णय अपनी पत्नी से विचारकर लोगे! क्या तुम्हें स्वीकार है?’’

‘‘हाँ!‘‘

आज के बाद जीविकोपार्जन के लिए कमाये हुऐ धन को अपनी पत्नी से विचारकर खर्च करोगे! क्या तुम्हें स्वीकार है?’’

‘‘हाँ!‘‘

‘‘आज के बाद तुम देश-परदेस, जिस दिशा में भी यात्रा करोगे सदैव अपनी पत्नी को अपने साथ रखोगे! क्या तुम्हें स्वीकार है?’’

‘‘हाँ!‘‘

‘‘आज के बाद पूजा, हवन, यज्ञ आदि सभी धार्मिक कार्य अपनी पत्नी के साथ ही करोगे! क्या तुम्हें स्वीकार है?’’

‘‘हाँ!‘‘

‘‘आज के बाद सुख-दुख, भाग्य-दुर्भाग्य, अमीरी-गरीबी, रोग-स्वास्थ्य, जीवन के हर उतार-चढ़ाव में सदैव अपनी पत्नी का साथ निभाओगे! उसका पालन करोगे! कभी उसका साथ नहीं छोड़ोगे! क्या तुम्हें स्वीकार है?’’

हाँ!‘‘ देव ने सिर हिलाया।

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