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गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563

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आज…. प्रेम किया है हमने….


सारा विवाह सम्पन्न हो गया। पण्डित ने पैसे, मिठाइयाँ, कपड़े ,बर्तन आदि सामग्री ली और प्रस्थान किया। अब गंगा, देव, गायत्री, संगीता, संगीता के पति, उसके दो बच्चे, देव की माँ सावित्री, रुकमणि, गंगासागर हलवाई सभी ने साथ बैठकर खाना खाया।

गंगा के बाबू ने पहले ही सारे रिश्तेदारों के बीच घोषणा कर दी थी कि उनका होने वाला दामाद ‘देव‘ घरजमाई बन उनकी दुकान संभालेगा। इसलिए विदाई का कोई चक्कर ही नहीं था इस पिक्चर में।

संगीता अपने पति व दोनों बच्चों के साथ अपने घर के लिये प्रस्थान कर गयी। सभी बड़ों की सहमति से गंगा और देव को सुहागरात मनाने की परमीशन दे दी गई। वहीं दूसरी ओर गंगा की माँ रुकमणि व बाबू गंगासागर हलवाई अपने कमरे में आराम करने चले गये।

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‘देव! जरा संभल के....’ गायत्री देव को कमरे तक छोड़ने आई। देव को सावधान किया। अन्दर गंगा देव का इन्तमार कर रही थी फुल मेकप किये हुये। घर के इस छोटे से मकान पर चारों ओर जमजम वाली बिजली की सजावट वाली झालरें लगा दी गयी थी जो एक बार जलती थी... फिर एक बार बुझती थीं।

रानीगंज अब धीमे-धीमे आधुनिक हो रहा था। रानीगंज के लोग गोशाला में जो कुछ भी नया देखते थे... तुरन्त ही खरीद लेते थे। जैसे लखनऊ से आने वाली नई रिलीज्ड फिल्मों की सीडियाँ, सजावट का सामान, नेपाल से स्मगलिंग कर के आने वाले जूते, बढि़याँ क्वालिटी की जैकेट्स आदि सामान। रानीगंज के लोग हमेशा गोशाला के लोगो की नकल करते थे और गोशाला के लोग लखनऊ की। मैंने जाना....

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