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काँच की चूड़ियाँ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :221
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9585

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एक सदाबहार रोमांटिक उपन्यास

सात

प्रताप के बंगले में प्रवेश करते ही बंसी रुक गया। तारामती अपने कमरे में बैठी रामायण पढ़ रही थी। यह मधुर वाणी और रामायण का पठन, वह कुछ समय तक वहीं खड़ा भक्ति रस में खोया रहा। जब भी वह इस ध्वनि को सुनता, उसे एक विशेष सुख का अनुभव होता---ऐसे लगता जैसे मन का बोझ उतर गया हो।

धीरे से दबे पांव वह उनके कमरे में आया और देहरी के पास ही खड़ा हो गया। तारामती रामायण पढ़ते-पढ़ते रुक गई और गर्दन उठाकर द्वार की ओर देखने लगी। बंसी को पहचान उसने अपना आंचल संवारा। उसके अधरों पर दैवी मुस्कान की एक रेखा फूट आई।

''आओ बंसी!''

कमरे में अंधेरा हो गया था। बंसी ने आगे बढ़कर बत्ती जला दी और फिर हाथ जोड़कर मालकिन को अभिवादन किया।

''पाठ में इतनी खो गई कि पता ही न चला कब शाम हो गयी..'' तारामती पुस्तक बन्द करते हुए बोली।

''जिसके मन में प्रकाश हो उसे बाहर के अंधेरे की क्या चिन्ता।'' कहते हुए उसने दफ्तर की तालियां मालकिन के सामने बढ़ा दीं।

''बंसी! तुम्हारे मालिक नहीं आये क्या?'' तारामती ने पुस्तक बन्द करते हुए पूछा।

''नहीं,.. कह रहे थे शहर किसी अफसर को मिलने जाना है। लौटने में शायद देर हो जाये।''

''ओह... आओ बैठो।''

''बस मालकिन। अब तो आज्ञा दीजिए, घर पहुँचने की जल्दी है। कई दिन से बच्चों से नहीं मिल पाया। सवेरे मुंह-अंधेरे ही चला आता हूं और जब लौटता हूं तो बच्चे सो चुके होते हैं।''

''तब मैं तुम्हें नहीं रोकती.. बच्चों को कभी हमारे घर भी तो लाओ।''

''अवश्य लाऊँगा मालकिन।''

बंसी जाने लगा तो तारामती ने फिर रोकते हुए कहा-

''हां बंसी! इनकी और इच्छा थी.. ''

''क्या मालकिन?''

''वही कि गंगा बेटी को अपनी देख-भाल के लिए यहीं रखलूं...''

''किन्तु मालकिन..''

बंसी ने कुछ कहना चाहा, पर तारामती बीच में ही उसका आशय समझती हुई बोली- ''नौकरानी समझ के नहीं बंसी, बेटी जानकर... जानते हो, एक टांग न होने से मुझे कितना कष्ट होता है... मेरा दिन-भर का साथ हो जायेगा और तुम्हारी दो पैसों की सहायता हो जाएगी..?''

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