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नारी की व्यथा

नवलपाल प्रभाकर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9590

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मधुशाला की तर्ज पर नारी जीवन को बखानती रूबाईयाँ


77. आठ महीने तो मेरी


आठ महीने तो मेरी
जैसे-तैसे जिन्दगी बीती
पर चारों बेटों की मेरे प्रति
आज भी वही थी रीति

मुझे निकालने को थे आतुर
पर समाज के डर से व्याकुल

कैसी मैं इन पर भारी हूँ
क्योंकि मैं इक नारी हूँ।

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