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राख और अंगारे

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9598

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मेरी भी एक बेटी थी। उसे जवानी में एक व्यक्ति से प्रेम हो गया।

'अच्छा ही हुआ, जब आ गए तो। मैं बहुत अधीर हो रही थी। दरवाजा बन्द कर दो - कोई देख न ले।’

मोहन ने किवाड़ भिड़काकर सिकड़ी चढ़ा दी। रेखा के संकेत पर वह उनका अनुसरण करता हुआ उसके पीछे-पीछे चलने लगा। उसका इस तूफ्रानी वर्षा की रात में आने का मुख्य कारण था, उस पर अपने प्रेम का गहरा प्रभाव डालना और विश्वास को दृढ़तर बनाना, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। वह इसमें सफल हुआ।

रसोईघर से निकलकर रेखा उसे चुपके से अपने कमरे में ले आई और किवाड़ भीतर से बन्द कर दिया। प्रेम के सुनहरे जाल में फंसकर युवतियां कितनी साहसी बन जातीं हैं, इसे अनु भव कर मोहन मन ही मन मुस्करा उठा।

मोहन ने असावधानी से अपना कोट, कमीज उतारकर एक ओर रख दिया। सामने खूंटी पर लटकते तौलिए को उतारकर वह अपना शरीर पोछने लगा। पोंछकर कंघी से बालों को संवा- रता हुआ बोला- ‘हां रेखा, बाबा से बातचीत हुई?'

'कैसी वातचीत? विवाह के बारे में न?'

'हां-हां?'

'साहस तो बहुत किया। उनके सामने तक गई भी, पर मुंह से एक शब्द न निकाल सकी।'

'बहुत बुरा हुआ रेखा! बहुत बुरा! मोहन ने एक दीर्घ श्वास छोड़ा।

'अभी प्रतीक्षा की घड़ियां नहीं समाप्त हुई मोहन! अभी कुछ दिन तक रुकना पड़ेगा।'

'कब तक?'

'जब तक बाबा को प्रसन्न न कर लूं। वे आजकल खिंचे-खिंचे-से रहते हैं।'' ‘वह क्यों?

'वह मेरा विवाह रमेश बाबू से करना चाहते हैं।'

'तो फिर...!' घबराकर मोहन ने पूछा।

'घबरा क्यों गए? रेखा कच्ची मिट्टी की नहीं बनी है। मेरी स्वीकृत बिना विबाह हो ही कैसे सकता है?'

'यदि बाबा ने जबर्दस्ती की तो...?'

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