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राख और अंगारे

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9598

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मेरी भी एक बेटी थी। उसे जवानी में एक व्यक्ति से प्रेम हो गया।

'तो कल की रात...।'

'नहीं परसों...।'

मोहन मुस्कराते हुए उठा और रेखा के माथे पर आई हुई लट को सुलझाते हुए उसने रोशनदान की ओर देखा, वर्षा थम चुकी थी।

जैसे ही उसने भीगा हुआ कोट कंधे पर रखा, रेखा ने पूछा- 'रहते कहां हो?'

'फोर्ट विलियम के पीछे.. जनता होटल में।'

बाहर के किवाड़ में ताला लगाने के पश्चात् मोहन चल पड़ा गन्तव्य पथ की ओर। उसे विश्वास हो गया था कि अब रेखा पीछे न हटेगी। माता-पिता के सम्मुख यदि वह चट्टान के समान कठोर हो जाएगी तो, उन्हें अपनी बेटी की इच्छाओं पर झुकना ही पड़ेगा।

रेखा बड़ी देर तक चुपचाप इसी असमन्जस में वहीं खड़ी रही। उसके समक्ष एक ओर प्रेम का तकाजा और दूसरी ओर खानदान् की इज्जत और बावा का भय!

बाबा का विचार आते ही उसके सारे मनसूबे छिन्न-भिन्न हो गए। वह असहाय प्राणी की भांति बिस्तर पर आ गिरी। उसके मस्तिष्क में एक बड़े-से शून्य के अतिरिक्त कुछ नहीं रह गया।

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