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राख और अंगारे

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9598

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मेरी भी एक बेटी थी। उसे जवानी में एक व्यक्ति से प्रेम हो गया।

पन्द्रह

उसी पीड़ा में उसने कहना आरम्भ किया। रेखा अवाक् बैठी उसकी बातें सुनने लगी- 'मेरी भी तुम्हारे समान एक बेटी थी। उसे जवानी में एक आवारा व्यक्ति से प्रेम हो गया। मेरे लाख समझाने पर भी वह बाज न आई और एक दिन.... गला अवरुद्ध हो जाने के कारण वह जरा रुका और फिर गला साफ कर बोला, एक दिन अवसर पाकर उसके साथ घर से भाग गई। परन्तु उस आवारा ने उससे विवाह नहीं किया। नर्तकी बनाकर बीच- मझधार में छोड़ दिया। स्वयं उसकी कमाई पर ऐश करता रहा... अन्त में उस पगली ने उस आवारा के प्रति सच्चे प्रेम स्वरूप अपने प्राणों की बलि दे दी।

'यह कबकी घटना है?' रेखा व्याकुलता को न रोक सकी, पूछ ही बैठी।

'कुछ दिनों की बात है स्टेज पर नाचते हुए..।'

'क्या नाम शा उसका?'

'मेरी गोपी.. परन्तु... दुनिया वालों की तबस्सुम!'

तबस्सुम का नाम सुनते ही वह चौंक पड़ी। उसके सामने उस रात वाला दृश्य घूम गया, जब वह मोहन के साथ तबस्सुम का नाच देखनेँ गई थी और स्टेज पर नाचने-नाचते वह बेहोश हो गिर पड़ी थी।

'और वह आवारा व्यक्ति कौन था..?'

'तुम्हारा मोहन.....'

माली के मुंह से यह शव्द सुनते ही रेखा का सिर घूम गया। उसके पीले मुख पर कालिमा-सी छाने लगी। वह फर्स पर गिर गई होती यदि माली ने उसे वढ़कर थाम न लिया होता।

'तो क्या यह सच है?' कुछ स्वस्थ होने पर उसने पूछा।

‘हां बेटी... मुझ बूढ़े की आंखों में देखो,.. क्या तुम्हें इनमें ममता और स्नेह का सागर उमड़ता दिखाई नहीं देता?'

रेखा ने यह सुनते ही अपना सिर माली की छाती पर रख दिया। दो पीड़ित और लुटे हुए हृदय, एक-दूसरे को शान्ति और सांत्वना प्रदान करने लगे।

'परन्तु अब क्या होगा?' रेखा प्यार से माली के सीने का सहारा लेती हुई बोली। ‘धैर्य से काम लो... जब तुम निर्दोष और पवित्र हो तो क्यों डरती हो.. तुम मेरी गोपी की भांति कायर नहीं। वह तो मूर्ख और अनपढ़ थी.. तुम अपना बुरा-भला स्वयं सोच सकती हो... तुम्हारी प्रतिष्ठा अभी घर की चहारदीवारी में ही है... तुम्हें हर पग उजाले में रखना होगा।

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