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राख और अंगारे

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9598

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मेरी भी एक बेटी थी। उसे जवानी में एक व्यक्ति से प्रेम हो गया।

'इसीलिए कि मैं उन सबकी भांति कायर और मूर्ख नहीं कि जो चाहे खिलौना समझकर खेले और तोड़कर चला जाये। मेरा भी दिल है,... मेरी भी कुछ आकांक्षायें हैं... समाज में मेरा भी मान-सम्मान है...!'

'मान-सम्मान, आकांक्षाएं हैं! परन्तु यह सब मिलकर तो तुम्हारी बेवफाई का कलंक नहीं मिटा सकते... फिर भी लोग तुम्हें बेवफा ही कहेंगे... भगवान भी तुम्हें क्षमा न करेंगे।'

'बेवफा - कौन कहता है? मैं बेवफा हूं..! मैंने किसी से बेवफाई नहीं की। जबतक इस संसार में मानव है, मानव के पहलू में हृदय है, पीड़ा और अनुभव करने की शक्ति है, वह मुझे बेवफा नहीं कह सकता... और जो ऐसा कहेगा उसका हृदय - हृदय नहीं, पत्थर है।' ऐसे लगा जैसे वह तस्वीर उसकी बातों पर खिलखिलाकर हंसने लगी हो और उसके कान उन भयानक ठहाकों से गूंजने लगे हों। रेखा ने आवेश में आकर क्षुब्ध मन से पास रखा फूलदान उठाया और दर्पण पर दे मारा, एक धमाका हुआ और दर्पण चूर-चूर होकर धरती चूमने लगा।

चंद क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया फिर सहसा जोर से किवाड़ खटखटाने की आवाज आने लगी। रेखा कांपते होठों से चिल्लाई, ’पुलिस...?' और डर से एक कोने में छिप गई।

'रेखा-रेखा..।' किसी ने पुकारा। यह बाबा की आवाज था जो धमाका सुनकर आ पहुंचे थे। वह फिर भी चुप रही। उसने आश्चर्य से किवाड़ की ओर देखा, परन्तु अपने स्थान से न हिली।

राणा साहब ने दरवाजे के ऊपर वाला शीशा तोड़ भीतर की चटखनी खोल दी। किवाड़ खुलते ही राणा साहब और श्रीमती राणा, बेटी की ओर लपके। उनके पीछे-पीछे माली और शम्भू भीतर आ गये। मां ने उसे गले लगाते हुए पूछा-- 'क्यों, क्या हुआ बेटी?’

'क्या अकेले में डर गई! राणा साहब ने उसे बिस्तर पर लिटाते हुए पूछा - उन्होंने देखा, पसीने में उसके कपड़े इस तरह भीग गए हैं मानो वर्षा में भीगे हों।

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