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राख और अंगारे

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9598

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मेरी भी एक बेटी थी। उसे जवानी में एक व्यक्ति से प्रेम हो गया।

इसी समय भारी जूतों की चाप सुनकर वह एकाएक चौकन्नी हो गई और आधा धड़ उठाकर सामने रोशनदान की ओर देखने लगी। कोई व्यक्ति भारी पांव उठाता रोशनदान के सामने से गुजर गया। शायद पहरे का कोई सिपाही था, जो फुटपाथ पर गश्त लगा रहा था।

यह मकान बहुत पुराना था और शहर के आखिरी छोर पर स्थित था। नई पक्की सड़क इसकी छत के पास से गुजरती थी। इसलिए इस मकान का रोशनदान सड़क के फुटपाथ को छू रहा था।

पहरे का सिपाही आगे बढ़ गया। सड़क पर बिजली की रोशनी फैली थी जो छन-छनकर उस रोशनदान के भीतर आ गई थी, जिससे दीवारों पर छायाचित्रों-सी परछाइयां मिट-उभर रही थीं...... भयानक और हृदय हिला देने वाली।

नींद तो नहीं आ रही थी। एकाएक उठी और कागज- कलम लेकर मोहन को पत्र लिखने बैठ गई। उसने उसे पाने का उपाय ढूंढ लिया था। उसे विश्वास था वह आएगा।

दो दिन पश्चात् ही एक अन्धेरी रात में जवकि सर्वत्र घोर सन्नाटा छाया हुआ था, सड़क पर बिजली की फीकी रोशनी में चौकीदार गश्त लगा रहा था, मोहन एक स्तम्भ की ओट में राणा साहब के मकान की ओर टकटकी लगाए खड़ा था। उसकी मुखाकृति पर भय और बेचैनी स्पष्ट झलक रही थी। इस सन्नाटे में उसका बेचैन हृदय इस तरह धड़क रहा था मानो लोहार के हथौडे की चोट उसके हृदय पर पड़ रही हो।

रात के ग्यारह बजने को थे। किन्तु राणा साहब के मकान की बत्तियां अभी बुझी नहीं थीं। न जाने कब तक वह उसी अव- स्था में खड़ा देखता रहा। क्रमशः सभी बत्तियां बुझ गईं और मकान पर काली चादर बिछ गई।

स्तम्भ की आड़ में छिपा मोहन मुस्करा पडा। अंधेरा ही तो उसका सहारा था।

अव वह धीरे-धीरे रोशनदान की ओर बढ़ा। उसके पांवों में पहले की-सी दृढता आ गई और भय से धड़कता हुआ मन अपनी स्वाभाविक स्थिति पर आ गया।

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