लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्री दुर्गा सप्तशती (दोहा-चौपाई)

श्री दुर्गा सप्तशती (दोहा-चौपाई)

डॉ. लक्ष्मीकान्त पाण्डेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :212
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9644

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

212 पाठक हैं

श्री दुर्गा सप्तशती काव्य रूप में

तप हित गवन बनिक, नृप कीन्हा।
पुनि जेहिं विधि मां दरसन दीन्हा।।
सकल कथा अब सुनहु मुनीसा।
नदी पुलिन पहुंचे अवनीसा।।
देवी सूक्त जपहिं धरि ध्याना।
बहु विधि पूजहिं करि सनमाना।।
मूर्ति मृत्तिका की करि राखी।
सदा रहहिं दरसन अभिलाषी।।
करि अरचन षोडस उपचारा।
जप तप भजन हवन सतकारा।।
घटि अहार तन छीजत जाई।
निराहार पुनि दृढ़ मति लाई।।
सुमिरत भजत रहत थिर ध्याना।
निज तन रुधिर करत बलिदाना।।
तीन बरस एहि विधि तप कीन्हा।
जग जननी तब दरसन दीन्हा।।


प्रगटी मां जगदम्बिका, पुरवत उर अभिलाष।
बर मांगहु भूपति, बनिक, पूर करब सब आस।।३क।।
अति प्रसन्न तुम दोहुं पर, मांगहु तुम बरदान।
जे जन सब तजि मोहि भजत, राखउं तेहि कर मान।।३ख।।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

लोगों की राय

No reviews for this book