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श्री दुर्गा सप्तशती (दोहा-चौपाई)

डॉ. लक्ष्मीकान्त पाण्डेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :212
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9644

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श्री दुर्गा सप्तशती काव्य रूप में

भारतीयता की रक्षा तो सनातन संस्कृति से ही मुमकिन है। इसके लिए ब्राह्मणों को जगाना होगा। विचार और ज्ञान भारत के उत्कर्ष पथ की सनातन संस्कृति भारतीयता की जीवनी शक्ति है जिसे सांस्कृतिक आदर्श, पद्धतियां और व्यवस्थाएं प्राणवान करती रही हैं। ब्राह्मणों को इसलिए भी जागना होगा क्योंकि आज का राजनैतिक एवं सामाजिक प्रवाह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के कर्म रूपों को अव्यवस्थित कर रहा है। पाश्चात्य संस्कृति जन्य प्रमाद और अविवेक से मानवता के समक्ष संकट पैदा हो गया है। ब्राह्मणों ने सदियों पहले उद्‌घोष किया था कि वे अपने राष्ट्र को, इस धरती को जीवंत और जागृत बनाए रखेंगे। इसके लिए वे चिरकाल तक सक्रिय भी रहे लेकिन एक बार फिर समय आ गया है कि ब्राह्मण अपना दीप खुद बनें। 'अप्प दीपो भव।' उन्हें नीति, धर्म और मर्यादा की राह पर चलाएं। इसके लिए उन्हें खुद का भी सुधार, परिष्कार करना होगा। अथर्ववेद के ऋषि ने ब्राह्मणों को जो उपदेश दिया था, उस पर अमल करने, उसे जीवन में उतारने और तदनुरूप वातावरण बनाने का समय आ गया है।

'उतिष्ठ ब्राह्मणस्पते देवान यज्ञेन बोधय।
आयु: प्राणं प्रजां पशून् कीर्तिं यजमानं च वर्धय।'

अर्थात हे ब्राह्मण, उठ और श्रेष्ठता की इच्छा करने वालों को अपने ज्ञान द्वारा समृद्ध बना। तेरे यजमान आयु, प्राण, प्रजा (सनातन) पशु और यश प्राप्त करें। ऐसे ब्राह्मण के उठने और जागने का आह्वान है जो त्याग-तपस्या का प्रतीक रहा है।

मनुस्मृति में भी कहा गया है कि –

'भूतानां प्राणिन: श्रेष्ठा, प्राणिनां बुद्धिजीविन:।
बुद्धिमत्सु नरा: श्रेष्ठा नरेसु ब्राह्मणास्मृता।
ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सुकृतबिद्धयः।
कृतबुद्धिसुकर्तार: कर्तृसु ब्रह्मवेदिनः।'


ब्राह्मणों को अपनी प्रतिभा समाज, राष्ट्र और मानव मात्र के कल्याण के लिए लगानी होगी। भारतीय धर्मग्रंथों की समाज में पुनश्च प्रतिष्ठा करानी होगी। तभी यह देश सही मायने में आगे बढ सकेगा।

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