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उपन्यास >> कंकाल

कंकाल

जयशंकर प्रसाद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :316
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9701

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कंकाल भारतीय समाज के विभिन्न संस्थानों के भीतरी यथार्थ का उद्घाटन करता है। समाज की सतह पर दिखायी पड़ने वाले धर्माचार्यों, समाज-सेवकों, सेवा-संगठनों के द्वारा विधवा और बेबस स्त्रियों के शोषण का एक प्रकार से यह सांकेतिक दस्तावेज हैं।


यमुना ने एक बार फिर उसकी ओर क्रोध से देखा। वह चुप भी न हो सकी थी कि फरसा रखकर सिर से पसीना पोंछते हुए मंगल ने घूमकर देखा, 'यमुना!'

ढीठ घण्टी से अब कैसे रहा जाय, वह झटककर बोली, 'ग्वालिनी! तुम्हें कान्ह बुलावे री!' यमुना गड़ गयी, मंगल ने क्या समझा होगा वह घण्टी को घसीटती हुई बाहर निकल आयी। यमुना हाँफ रही थी। पसीने-पसीने हो रही थी। अभी वे दोनों सड़क पर पहुँची भी न थीं कि दूर से किसी ने पुकारा, 'यमुना!'

यमुना मन में संकल्प-विकल्प कर रही थी कि मंगल पवित्रता और आलोक से घिरा हुआ पाप है कि दुर्बलताओं में लिपटा हुआ एक दृढ़ सत्य उसने समझा कि मंगल पुकार रहा है, वह और लम्बे डग बढ़ाने लगी। घण्टी ने कहा, 'अरी यमुना! वह तो विजय बाबू हैं। पीछे-पीछे आ रहे हैं।'

यमुना एक बार काँप उठी-न जाने क्यों, पर खड़ी हो गयी, विजय घूमकर आ रहा था। पास आ जाने पर विजय ने एक बार यमुना को ऊपर से नीचे तक देखा।

कोई कुछ बोला नहीं, तीनों घर लौट आये।

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