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कुसम कुमारी

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :183
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9703

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रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी

बीरसेन–कभी नहीं।

बीरसेन के साथ रनबीरसिंह बाहर आए और दीवान खाने में बैठ दीवान साहब को बुलाने का हुक्म दिया।

यह बीरसेन बड़े ही जीवट का आदमी था। इसकी उम्र बीस वर्ष से ज्यादे की न होगी। यह बिना मां-बाप का लड़का था, मां तो इसकी जापे (सौरी) ही में मर गई थी और बाप जो यहां की फौज का सेनापति था इसे तीन वर्ष का छोड़कर मरा था।

कुसुम कुमारी के पिता ने अपने लड़के के समान इसकी परवरिश की और लिखाया-पढ़ाया। लड़कपन ही से बीरसेन का सिपाहियाना मिजाज देख इस फन की बहुत अच्छी तालीम दी गई। मरते समय कुसुम कुमारी के पिता उससे कह गए थे–‘‘कुसुम, तुम इसे अपने सगे भाई के समान मानना, इसके बाप से मुझसे बहुत ही मुहब्बत थी।’’

ईश्वर इच्छा से रनबीरसिंह को देखते ही बीरसेन के दिल में उनकी सच्ची मुहब्बत पैदा हो गई, इनके बहादुराना शान-शौकत और हौसले पर वह जी-जान से आशिक हो गया था।

उदास मुख दीवान साहब भी आ मौजूद हुए। रनबीरसिंह ने मौके-मौके से दुरुस्त करके मुख्तसर में वह सब हाल उन्हें कह सुनाया जो कालिंदी के बारे में बीरसेन ने सुना था।

वह सब हाल सुनते ही दीवान साहब की हालत बिलकुल बदल गई, गम की जगह गुस्सा आ गया, कुछ सोचने के बाद क्रोध से कांपती हुई आवाज में बीरसेन से बोले–‘‘बीरसेन, मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगा अगर उस कंबख्त का सर लाकर मेरे हवाले करोगे!’’

तीनों में देर तक बातचीत होती रही जिसके लिखने की यहां कुछ जरूरत नहीं मालूम पड़ती।

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