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नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


गौरा थोड़ी देर वैसे उलहने से देखती रही। फिर उसने कहा, “हो सकता है। यों मेरे लिए भी यही बात है - अभी जहाँ तक मुझे दीखता है, उसी के अनुसार मैंने भी सोच लिया है; आगे जब-नया वर्तमान खुलेगा तब उसके अनुसार और सोच लूँगी। नहीं तो आप ही बताइये।”

भुवन ने कुछ सोचते हुए कहा, “हाँ, यों तो ठीक है।”

अगली गाड़ी से गौरा चली गयी थी। जाने के समय वातावरण कुछ स्वच्छ हो गया था; भुवन ने यह भी कहा था कि अगले दशहरे की छुट्टियों में वह शायद बनारस आएगा - दो-एक दिन, फिर गौरा के साथ दिल्ली लौटेगा अगर उसके पिता वहाँ होंगे, या अगर मसूरी होंगे तो वहीं जाएगा। गौरा ने कहा था, “ज़रूर चलिएगा - आप पिता जी को बहुत नेग्लेक्ट करते रहे हैं - रहे हैं न?” फिर चारों ओर नज़र डालकर कहा था, “घर को भी आपने नेग्लेक्ट कर रखा है। मैं एक-दो दिन रह जाती तो सब सँभाल देती - पर आप रहने ही कहाँ देते हैं?” भुवन ने हँस कर उत्तर दिया था, “घर की सँभाल एक-दो दिन का काम थोड़े ही है, गौरा? एक बार सँभालोगी, फिर वैसा ही हो जाएगा-पर वैसे नुक्स क्या है, मुझे जबानी ही बता दो, मैं सँभालूँगा।”

“ऐसे काम जबानी ही हो सकते तो...।”

“तो क्या?”

लेकिन गौरा ने अपना वाक्य पूरा नहीं किया था।

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