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नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


गौरा...अभी नहीं सोचेगी। वैसा ही है, तो वैसा ही हो। वह साँस, वह शिखा, छोड़कर चली जाये तो चली जाये। उस साँस से वंशी वंशी है, जिसमें समूचे वन-प्रान्तर की आकांक्षा बोलती है, नहीं तो केवल बाँस की एक पोर; फिर भी...

फिर उसने लिखना आरम्भ किया :

“वचन दो कि तुम अपने को अनावश्यक संकट में नहीं डालोगे...। जो आवश्यक है, उससे मेरी होड़ नहीं, वह तुम्हें पुकारे, उसे तुम वरो; पर जो अनावश्यक है, उसे तुम नहीं पुकारोगे!”

पैड को थोड़ा परे सरका कर, उसने निस्वन ओठों से पुकारा, “भुवन...” फिर वैसे ही दुबारा, “भुवन...।”

“मैं तुम्हें पुकारती हूँ। बार-बार पुकारती हूँ, यहाँ तक कि मेरी पुकार ही सम्मोहिनी बनकर मुझे शान्त कर देती है, मेरी माँग को सुला देती है।”

उठकर उस ने दो-तीन चक्कर लगाये। फिर धीरे से बाहर निकल कर वह भुवन के कमरे तक गयी; किवाड़ से कान लगा कर उसने सुना, कोई शब्द नहीं था। किवाड़ों के बीच की दरार से झाँका, भीतर अँधेरा था; आग की बहुत हलकी-सी लोहित आभा थी, बस। लौटती हुई क्षण-भर वह बीच के कमरे के आगे ठिठकी, उसका मन हुआ कि भीतर से सितार निकालकर बजाने बैठे; पर फिर आगे बढ़कर अपने कमरे में चली गयी। किवाड़ बन्दकर के बत्ती बुझाकर लेट गयी।

दूर बहुत हलके चार खड़के, पर गौरा ने नहीं सुना।

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