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नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


“मेरी राय तो यही है कि यह नाटक तुम न खेलो। क्यों नहीं कोई आधुनिक हिन्दी नाटक लेती?”

“जैसे?”

“प्रसाद का कोई छोटा नाटक, “राज्यश्री' या 'ध्रुवस्वामिनी'।”

“ये मैंने नहीं पढ़े।”

भुवन ने हँस कर कहा, “तो यह थी एफ़िशेंसी की पोल! खुल गयी न?”

गौरा ने थोड़ा रूठकर कहा, “सर्वज्ञ तो सिर्फ़ वैज्ञानिक होता है। फिर मैं वैसे ही अनपढ़ हूँ। क्या करूँ, आपने कुछ पढ़ाया ही नहीं।”

“ठीक है। तो लो, अब प्रायश्चित्त करता हूँ। तुम कल तक दोनों नाटक पढ़ कर आओ।”

“और अगर उनमें भी कुछ हेर-फेर करना पड़ा तो? आप करेंगे न?”

“देखा जाएगा” भुवन हँसा, “तुम्हारी बात तो ऐसी है मानो नाटक से उसका एडैप्टेशन ही ज्यादा महत्त्व का हो।”

“हाँ, मेरे काम में आप का भाग ज़रूरी है, भुवन दा।” कहकर गौरा कुछ रुक गयी। “आपके मित्र तो कहते थे, आप अभिनय भी कर सकते हैं, तो....”

“एक वह पागल है और एक तुम!” भुवन कुछ और कहने जा रहा था पर रुक गया। “पुस्तकें तुम्हें मिल जायेंगी न?”

“ज़रूर।”

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