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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


“और ऐसा भी तो हो सकता है कि बात सीधी-सादी न हो सकने के कारण समझ में न आ रही हो,” कहकर भारती खिलखिलाकर हंस पड़ी।

अपूर्व भी हंस पड़ा। उसे संदेह हुआ कि इतनी देर से भारती शायद उसे झूठमूठ ही परेशान कर रही थी।

जल समाप्त हो गया था। खाली गिलास देखकर भारती व्यग्र हो उठी “यह जो....?”

“क्या और जल नहीं है?”

“है तो,” कहकर भारती क्रुद्ध होकर बोली, “इतना नशा करने से मनुष्य को याद नहीं रहता। पीने के पानी का लोटा शिबू नीचे के नल पर ही छोड़ गया। अब आप हाथ धोकर पी लीजिए। लेकिन क्रोध मत कीजिए, यह कहे देती हूं।”

अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “इसमें क्रोध करने की क्या बात है?”

भोजन के समय पीने भर को जल न मिलने पर बड़ी अतृप्ति होती है। लगता है पेट नहीं भरा। लेकिन इसीलिए कुछ छोड़कर उठ जाने से भी तो काम नहीं चलता। अच्छा जाऊं, जल्दी से शिबू को बुला लाऊं।”

भोजन समाप्त हो चुका था। फिर भी जबर्दस्ती दो-चार कौर मुंह में ठूंसकर जब वह उठकर खड़ा हुआ तो उसे लज्जा महसूस होने लगी। बोला, “मैं सच कह रहा हूं, मुझे किसी प्रकार की असुविधा नहीं हुई। मैं हाथ धोने के बाद पानी पी लूंगा।”

भारती हंसकर बोली, “मैं रोशनी दिखाती हूं। आप नीचे चलकर मुंह धो लीजिए। जल का लोटा सामने ही रखा है। भूल न जाइएगा।”

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