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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


होश आने पर पहले तो मैं अपनी अवस्था अच्छी तरह समझ भी न सका। मस्तक पर हाथ ले जाकर अनुभव किया कि यह तो आईस-बेग है। आँखें मिलमिलाकर देखा कि मकान के भीतर एक खाट पर पड़ा हूँ। सामने स्टूल के ऊपर एक दीपक के पास दो-तीन दवा की शीशियाँ और उसके पास एक रस्सी की खाट पर कोई मनुष्य लाल चेक का रैपर शरीर पर लपेटे हुए सो रहा है। बहुत देर तक मैं कुछ भी याद न कर सका। इसके बाद, एक-एक करके, जान पड़ने लगा, मानो नींद में कितने ही स्वप्न देखे हैं। अनेक लोगों का आना-जाना उठाकर मुझे डोली में डालना, मस्तक उठाकर दवाई पिलाना, ऐसे कितने ही व्यापार दिखाई पड़े।

कुछ देर बाद, जब वह मनुष्य उठकर बैठ गया तब, देखा कि कोई बंगाली सज्जन हैं, उम्र; अठारह-उन्नीस से अधिक नहीं। उस समय सिरहाने के निकट से मृदु-स्वर में जिसने उसको सम्बोधन किया उसका स्वर मैंने पहिचान लिया।

प्यारी ने अति मृदु कण्ठ से पुकारा, “बंकू, बरफ को एक बार और बदल क्यों नहीं दिया बेटा?”

लड़का बोला, “बदले देता हूँ, तुम थोड़ा-सा सो लो न माँ। डॉक्टर बाबू जब कह गये हैं कि शीतला नहीं है, तब डरने की कोई बात नहीं है माँ।”

प्यारी बोली, “अरे भइया, डॉक्टर के कहने से, कि डर की कोई बात नहीं हैं, औरतों का भय कहीं जाता है? तुझे चिन्ता करने की जरूरत नहीं है बंकू, तू तो बरफ बदल कर सो जा- फिर रात को मत जागना।”

बंकू ने आकर बरफ बदल दिया और लौटकर वह फिर उसी खटिया पर जा पड़ा। थोड़ी ही देर बाद जब उसकी नाक बजने लगी तब मैंने धीरे से पुकारा “प्यारी!”

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