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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“तेरह दिन” कहकर उसने बड़ी बूढ़ी पुरखिन की तरह गम्भीर भाव से कहा, “देखो, लड़के-बालों के सामने मुझे यह नाम लेकर मत पुकारा करो। बहुत दिनों तक 'लक्ष्मी' कहकर पुकारा किये हो, वही नाम लेकर क्यों नहीं पुकारते?”

दो दिन से मैं खूब होश में था। मुझे भी सब बातें याद आ गयी थीं। मैंने कहा, “अच्छा।” इसके बाद, जिस बात के कहने के लिए बुलाया था उसे मन ही मन अच्छी तरह सजाकर कहा, “मुझे ले जाने की चेष्टा कर रही हो, किन्तु, मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिए हैं, अब और नहीं देना चाहता।”

“तो फिर क्या करना चाहते हो?”

“मैं सोचता हूँ, अब जैसा मैं हूँ, उससे जान पड़ता है कि तीन-चार दिन में ही, अच्छा हो जाऊँगा! तुम लोग चाहे तो इतने दिन और ठहर कर घर चले जाओ।”

“तब तुम क्या करोगे, सुनूँ तो?”

“जो कुछ होना होगा सो हो जायेगा।”

“सो हो जायेगा” कहकर प्यारी कुछ हँस दी। इसके बाद सामने आकर खाट पर एक ओर बैठकर, मेरे मुँह की ओर देखकर, क्षण-भर चुप रहकर फिर कुछ हँसकर बोली, “तीन-चार दिन में तो नहीं, दस-बारह दिन में यह रोग चला जायेगा, यह मैं जानती हूँ; परन्तु असली रोग कितने दिनों में दूर होगा - सो क्या मुझे बता सकते हो?”

“असली रोग और क्या?”

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