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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


बंकू कुछ देर चुप रहकर बोला, “मचती रहे हम लोगों को 'जाति से अलग' कर रक्खा है, सो इससे कुछ हम अपनी माँ को छोड़ थोड़े ही सकते हैं? और ऐसी माँ भी कितने लोगों को नसीब होती है!”

मुँह में आया कि पूछूँ, “माँ के ऊपर इतनी भक्ति कैसे हुई?” किन्तु दबा गया।

बंकू कहने लगा, “अच्छा आप ही कहिए, गाने-बजाने में क्या कोई दोष है? हमारी माँ केवल वही करती हैं। कुछ पराई निन्दा, पराई चर्चा तो करती नहीं? बल्कि, गाँव में जो लोग हमारे परम शत्रु हैं उन्हीं के आठ दस लड़कों को पढ़ाई-लिखाई का खर्च देती हैं; शीत काल में कितने ही लोगों को कपड़े देती हैं, कम्बल देती हैं, यह क्या बुरा करती हैं?”

मैंने कहा, “नहीं, वह तो बहुत ही भला काम है।”

बंकू ने उत्साहित होकर कहा, “तब कहिए, हमारे गाँव के समान पाजी गाँव क्या और कोई है? यही देखो न उस वर्ष ईंटें पकाकर हम लोगों ने मकान बनवाया। गाँव में पानी की भयानक तकलीफ देखकर माँ मेरी माँ से बोलीं, जीजी, और कुछ रुपये खर्च करके ईंटें पकाने के भट्ठे की जगह ही एक तालाब ही न बनवा दिया जाय? तीन-चार हजार रुपये खर्च करके तालाब बनवा दिया। घाट भी बँधवा दिया। किन्तु, गाँव के लोगों ने माँ को उस तालाब की प्रतिष्ठा न करने दी। ऐसा बढ़िया पानी- किन्तु कोई पीएगा नहीं, कोई छुएगा नहीं, ऐसे बदजात आदमी हैं। केवल इस ईर्ष्या के मारे सब मरे जाते हैं कि हमारा मकान पक्का बन गया। आप समझे न?”

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