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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मुझे देखते ही प्यारी के चेहरे का समस्त खून मानो कहीं अन्तर्हित हो गया। इसके बाद उसने जबर्दस्ती कुछ हँसकर कहा, “यह क्या, श्रीकान्त बाबू हैं। कब आये?”

“आज ही।”

“आज ही? कब? कहाँ ठहरे हैं?”

क्षण-भर के लिए शायद मैं कुछ हतबुद्धि-सा हो गया; नहीं तो उत्तर देने में देर न होती। परन्तु, अपने आपको सम्हालने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। मैंने कहा, “यहाँ के सब लोगों को तुम चीन्हती नहीं हो, इसलिए, नाम सुनकर भी न चीन्ह सकोगी।”

जो महाशय सबसे अधिक बने-ठने थे वही शायद इस यज्ञ के यजमान थे। बोले, “आइए बाबूजी, बैठिए।” इतना कहकर होठों को दबाकर जरा वे हँसे। भाव-भंगी से उन्होंने यह प्रकट किया कि हम दोनों का सम्बन्ध वे ठीक तौर से भाँप गये हैं! उनका आदर के साथ अभिवादन कर मैंने, जूते के फीते खोलने के बहाने, मुँह नीचा करके परिस्थिति को भाँप लेना चाहा। विचार करने के लिए अधिक समय नहीं था, यह ठीक है, परन्तु, इन थोड़े से क्षणों में मैंने यह स्थिर कर लिया कि हृदय के भीतर कुछ भी हो, बाहर के व्यवहार में वह किसी भी तरह प्रकाशित न होना चाहिए। मेरे मुँह की बातचीत से, आँखों की चितवन से, मेरे सारे आचरण के किसी भी छिद्र में से, अन्तर के क्षोभ अथवा अभिमान की एक बूँद भी बाहर आकर न गिरनी चाहिए। क्षण-भर बाद जब मैं सबके बीच में जाकर बैठा तब, यद्यपि यह सच है कि अपने मुख की सूरत अपनी आँखों न देख सका, किन्तु भीतर ही भीतर मैंने अनुभव किया कि अब उस पर अप्रसन्नता का लेशमात्र भी चिह्न नहीं रह गया है। राजलक्ष्मी की ओर देखकर मैं हँसते हुए बोला, “बाईजी, यदि शुकदेव मुनिका पता पा जाता तो आज तुम्हारे सामने बिठाकर एक दफा उनके मन की शक्ति की जाँच कर लेता! अरे, यह किया क्या है! यह तो रूप का समुद्र ही बहा दिया है!”

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