लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


प्यारी ने कहा, “तुम ज्ञानी आदमी हो, तुम ही मेरी ठीक अवस्था को न जान सकोगे तो और जानेगा कौन? चलो, बच गयी।” इतना कहकर उसने एक दीर्घ श्वास दबाकर पूछा, “एकाएक आने का सच्चा कारण तो मैं जान ही न सकी कि क्या है?”

मैं बोला, “पहला कारण तो तुम नहीं सुन पाओगी, किन्तु दूसरा सुन सकती हो!”

“पहला क्यों नहीं सुन सकूँगी?”

“अनावश्यक है, इसलिए।”

“अच्छा, दूसरा ही सुनाओ।”

“मैं बर्मा जा रहा हूँ। शायद और फिर कभी मिलना न हो सके। कम से कम यह तो निश्चित है कि बहुत दिनों तक मिलाप न होगा। जाने के पहले एक दफे तुम्हें देखने आया हूँ।”

रतन कमरे में आकर बोला, “बाबू, आपके बिस्तर तैयार हैं, आइए।”

मैंने खुश होकर कहा, “चलो।” प्यारी से कहा, “मुझे बड़ी नींद आ रही है। घण्टे भर बाद यदि समय मिले तो एक दफे नीचे आ जाना - मुझे और भी बहुत-सी बातें करनी हैं।” इतना कहकर रतन को साथ लेकर मैं बाहर हो गया।

प्यारी के निज के सोने के कमरे में ले आकर रतन ने मुझे जब शय्या बताई तब मेरे अचरज की सीमा न रही। मैं बोला, “मेरे बिस्तर नीचे के कमरे में न करके यहाँ क्यों किये?”

रतन ने अचरज के साथ कहा, “नीचे के कमरे में?”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book