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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


भले ही कर लें किन्तु, मुझे मालूम है कि जो दो-चार आदमी बीच-बीच में देश जाते हैं वे चलते-चलाते कलकत्ते की गंगा में एकाध दफे गंगा-स्नान तो शायद कर लेते हों; किन्तु, अंग-प्रायश्चित कभी कोई नहीं करता। परदेश की आब-हवा के प्रभाव से ये लोग उस पर विश्वास नहीं रखते।

देखा कि होटल में सिर्फ दो हुक्के हैं। एक तो ब्राह्मणों के लिए, दूसरा जो ब्राह्मण नहीं हैं उनके लिए। भोजनादि के बाद कैवर्त के हाथ से डोम और डोम के हाथ से लुहार महाशय ने हाथ बढ़ाकर हुक्का ग्रहण किया और स्वच्छन्दता से पिया। दुविधा का लेश भी नहीं। दो दिन बाद उस लुहार के साथ बातचीत करते हुए मैंने पूछा, “अच्छा, इस तरह तुम्हारी जाति नहीं जाती?”

लुहार बोला, “जाती क्यों नहीं महाशय, जाती तो है ही!”

“तब?”

“उसने पहिले डोम कहकर अपना परिचय थोड़े ही दिया था; कहा था कि मैं कैवर्त हूँ। इसके बाद ही सब मालूम पड़ा।”

“तब तुम लोगों ने कुछ नहीं कहा?”

“कहते और क्या महाशय, काम तो बहुत ही बुरा हुआ, यह तो मंजूर करना ही पड़ता है। लेकिन कहीं उसे शर्मिन्दगी न उठानी पड़े, यह सोचकर सबने जान-बूझकर मामले को दबा दिया।”

“किन्तु देश में होते तो क्या होता?”

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