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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैंने आश्चर्य के साथ कहा, “बस, यही अपराध है?”

अभया ने उसी तरह शान्त-भाव से कहा, “यह क्या कोई तुच्छ अपराध है श्रीकान्त बाबू?”

“तुच्छ नहीं तो और क्या है?”

अभया बोली, “आपके समीप तुच्छ हो सकता है, किन्तु जो महाशय अपनी इस फिजूल की गले-पडूको खाने देते हैं वे कैसे माफ करेंगे? मेरा सिर दर्द करे तो उनका काम कैसे चल सकता है?”

रोहिणी बाबू एकदम तड़क कर गर्ज उठे और बोले, “तुम गले-पड़ू हो, मैंने यह कब कहा?”

अभया बोली, “कहोगे क्यों, हजार तरह से दिखा तो रहे हो?”

रोहिणी भइया बोले, “दिखा रहा हूँ! ओह, तुम्हारे मन में जलेबी जैसा पेंच है! यह तुमने मुझसे कब कहा था कि सिर दर्द कर रहा है?”

अभया ने कहा, “कहने से लाभ ही क्या था? क्या तुम विश्वास करते?”

रोहिणी भइया मेरी ओर पलटकर ऊँचे कण्ठ से बोल उठे, “सुनिये श्रीकान्त बाबू, ये सब बातें सुन रखिए। इन्हीं के लिए मैंने देश का त्याग किया- घर लौटने का रास्ता बन्द हो गया- अब इनके मुँह की बात सुनिये। ओह-”

अभया ने भी इस दफे गुस्से से जवाब दिया, “मेरा जो होना होगा हो जाएगा, तुम्हारी जब इच्छा हो देश लौट आओ! मेरे लिए तुम क्यों इतना कष्ट सहोगे? तुम्हारी कौन होती हूँ मैं? इस तरह ताना कसने की अपेक्षा...”

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