लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास

8

एकाएक अभया दरवाजा खोलकर आ खड़ी हुई; बोली, “जन्म-जन्मान्तर के अन्ध संस्कार के धक्के से पहले पहल अपने आपको सँम्हाल न सकी, इसीलिए मैं भाग खड़ी हुई थी श्रीकान्त बाबू, उसे आप मेरी सचमुच की लज्जा मत समझना।”

उसके साहस को देखकर मैं अवाक् हो गया। वह बोली, “आपको अपने डेरे को लौटने में आज कुछ देरी हो जायेगी, क्योंकि रोहिणी बाबू आते ही होंगे। आज हम दोनों ही आपके आसामी हैं। आपके विचार में यदि हम लोग अपराधी सुबूत हों, तो जो दण्ड आप देंगे उसे हम मंजूर करेंगे।”

रोहिणी को 'बाबू' कहते यह पहली बार ही सुना। मैंने पूछा, “आप वापस कब लौट आईं?”

अभया बोली, “परसों। वहाँ क्या हुआ, यह जानने का आपको निश्चय ही कुतूहल हो रहा है।” यह कहकर उसने अपना दाहिना हाथ उघाड़कर दिखाया। बेंत के निशान चमड़े पर जगह-जगह उभड़ रहे थे। बोली, और बहुत-से ऐसे निशान भी हैं जिन्हें आपको दिखा नहीं सकती।”

जिन दृश्यों को देखकर मनुष्य का पुरुषत्व हिताहित का ज्ञान खो बैठता है, यह भी उन्हीं में से एक था। अभया ने मेरे स्तब्ध कठोर मुख की ओर देखकर पल-भर में ही सब कुछ समझ लिया और कुछ हँसकर कहा, “किन्तु मेरे वापस लौट आने का यही एक कारण नहीं है श्रीकान्त बाबू, यह तो मेरे सतीधर्म का एक छोटा-सा पुरस्कार है। वे मेरे पति हैं और मैं उनकी विवाहिता स्त्री- यह इसी की जरा-सी बानगी है।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book