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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैं चुप हो रहा। इस बात को लेकर बहस करने की प्रवृत्ति नहीं हुई।

रात को राजलक्ष्मी ने कहा, “बंकू के ब्याह के लिए तो अब भी दस-बारह दिन की देर है; चलो न काशी चलें, तुम्हें अपने गुरुजी को दिखा लाऊँ।”

मैंने हँसकर कहा, “मैं क्या कोई नुमाइशी चीज हूँ?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “यह सोचने का भार जो लोग देखते उन पर है, तुम पर नहीं।”

मैंने कहा, “ऐसे ही सही, परन्तु, इससे मुझे ही क्या लाभ और तुम्हारे गुरुदेव को भी क्या लाभ होगा?”

राजलक्ष्मी ने गम्भीर होकर कहा, “लाभ तुम लोगों को नहीं है, किन्तु मुझे है न हो, तो केवल मेरे लिए ही चले चलो।”

इसलिए मैं राजी हो गया। आगे बहुत समय तक लग्न न थी, इसीलिए उस समय जैसे चारों ओर से विवाहों की बाढ़ आ गयी थी। जब तक बैण्ड का कार्नेट और बैग-पाइप की बाँसुरी विविध तरह के वाद्य-भाडों के सहयोग से मनुष्य को पागल बना डालने की तजवीज कर रही थी। हम लोगों की स्टेशन-यात्रा के समय भी इस तरह की कुछ उत्तम आवाजों की झड़ प्रचण्ड वेग से बह गयी। वेग के कुछ कम हो जाने पर राजलक्ष्मी ने सहसा प्रश्न किया, अच्छा, तुम्हारे मत से यदि सभी लोग चलने लगें, तो फिर गरीबों का विवाह ही न हो और घर-गिरस्ती भी न बने। तब फिर सृष्टि कैसे रहे?”

उसकी असाधारण गम्भीरता देखकर मैं हँस पड़ा। बोला, “सृष्टि-रक्षा के लिए चिन्ता करने की तुम्हें जरा भी जरूरत नहीं। क्योंकि हमारी तरह चलने वाले लोग दुनिया में अधिक नहीं हैं। कम से कम अपने इस देश में तो नहीं है; यह कहा जा सकता है।”

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