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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


साधु ने एक कौर नीचे उतारकर कहा, “आपका यह कुतूहल ही अनावश्यक है।”

राजलक्ष्मी जरा भी क्षुण्ण नहीं हुई, भले मानसों की तरह सिर हिलाकर बोली, “सो तो सच है। लेकिन, एक बार मुझे बहुत भुगतना पड़ा था, इसी से...” कहते हुए उसने मेरी ओर लक्ष्य करके कहा, “हाँ जी, तुम अपना वह ऊँट और टट्टू का किस्सा तो सुनाना! साधुजी को जरा सुना तो दो, अरे रे, भगवान भरोसा! घर में शायद कोई याद कर रहा है।”

साधुजी के गले में, शायद हँसी रोकने में ही, फन्दा लग गया। अब तक मेरे साथ उनकी एक भी बात नहीं हुई थी, मालकिन महोदय की ओट में मैं कुछ-कुछ अनुचर-सा ही बना बैठा था। अब साधुजी ने फन्दे को सँभालते हुए यथासाध्य गम्भीरता के साथ मुझसे पूछा, “तो आप भी शायद एक बार संन्यासी...”

मेरे मुँह में पूड़ी थी, ज्यादा बात करने की गुंजाइश न थी, इसलिए दाहिने हाथ की चार उँगलियाँ उठाकर गरदन हिलाते हुए मैंने कहा, “उँहूँ...एक बार नहीं, एक बार नहीं...”

अब तो साधुजी की गम्भीरता न टिक सकी, वे और राजलक्ष्मी दोनों खिल-खिलाकर हँस पड़े। हँसी थमने पर साधुजी ने कहा, “लौट क्यों आये?”

मैं अब तक पूड़ी का कौर लील न सका था, सिर्फ इशारे से राजलक्ष्मी को दिखा दिया।

राजलक्ष्मी ने मुझे डाँट-सा दिया, कहा, “हाँ, सो तो ठीक है! अच्छा, एक बार मान लिया मेरे लिए ही, सो भी ठीक सच नहीं है, असल में जबरदस्त बीमारी की वजह से ही।- मगर और तीन बार?”

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