लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मधु ने जमीन से माथा टेककर प्रणाम करके अपने साथियों के साथ प्रस्थान किया, परन्तु उसका चेहरा देखकर मालूम हुआ कि इस आशीर्वाद के भरोसे उसने कोई खास सान्त्वना प्राप्त नहीं की; आज की रात के लिए लड़की के पिता के अन्दर काफी उद्वेग बना ही रहा।

शुभ कर्म में पैरों की धूल देने के लिए मधु को आशा दी थी; परन्तु, सचमुच ही जाना होगा, ऐसी सम्भावना शायद हममें से किसी के भी मन में न थी। शाम के बाद दिए के सामने बैठकर राजलक्ष्मी अपने आय-व्यय का एक चिट्ठा पढ़कर सुना रही थी, मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ आँखें मीचे कुछ सुन रहा था और कुछ नहीं सुन रहा था, किन्तु पास ही ब्याह वाले घर का शोरगुल कुछ देर से जरा असाधारण रूप से प्रखर होकर मेरे कानों में खटक रहा था। सहसा मुँह उठाकर राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, “डोम के घर ब्याह है, मार-पीट होना भी उसका कोई अंग तो नहीं है?”

मैंने कहा, “ऊँची जात की नकल अगर की तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। वे सब बातें याद तो हैं तुम्हें?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “हाँ।” उसके बाद क्षण-भर तक कान खड़े करके एक गहरी साँस लेकर कहा, “वास्तव में, इस जले देश में हम लोग जिस तरह से लड़कियों को बहा देते हैं, उसमें छोटे-बड़े, भद्र-अभद्र सभी समान हैं। उन लोगों के चले जाने पर पता लगाया तो मालूम हुआ कि कल सबेरे वे उस बेचारी नौ साल की लड़की को न जाने किस अपरिचित घर-गृहस्थी में घसीट ले जाँयगे, फिर शायद कभी आने भी न देंगे। इन लोगों के यहाँ कायदा ही यही है। बाप एक कोड़ी चार रुपये में लड़की को आज बेच देगा। लड़की वहाँ एक बार मायके भेज देने का नाम तक भी नहीं ले सकती। ओहो, लड़की बेचारी कितनी रोयेगी बिलखेगी- ब्याह का वह अभी जानती ही क्या है, बताओ?”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book