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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


पहले तो मैं भी अपनी हँसी रोक न सका, फिर बोला, “महामहोपाध्याय दोनों ही थे। फिर भी, इसी तरह तो अब तक इन लोगों की लड़कियों की माताओं और दादियों के ब्याह होते आए हैं! राखाल के मन्त्र चाहे जैसे हों, पर शिबू पण्डित के मन्त्र भी 'ऋषिरुवाच' नहीं मालूम होते। मगर फिर भी, इनका कोई मन्त्र-विफल नहीं गया! इनका जोड़ा हुआ विवाह-बन्धन तो अब तक वैसा दृढ़- वैसा ही अटूट है!”

राजलक्ष्मी अपनी हँसी को दबाकर सहसा सीधी होकर बैठ गयी, और एकटक चुपचाप मेरे मुँह की ओर देखती हुई न जाने क्या-क्या सोचने लगी।

सबेरे उठकर सुना कि कुशारी महाशय। मधयाह्न-भोजन का निमन्त्रण दे गये हैं। मैं भी ठीक यही आशंका कर रहा था। मैंने पूछा, “मैं अकेला ही जाऊँगा क्या?”

राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “नहीं तो, मैं भी चलूँगी।”

“चलोगी?”

“चलूँगी क्यों नहीं!”

उसका यह नि:संकोच उत्तर सुनकर मैं अवाक् हो रहा। खान-पान हिन्दू-धर्म में क्या चीज है, और समाज उस पर कितना निर्भर है, राजलक्ष्मी इस बात को जानती है और मैं भी यह जानता हूँ कि कितनी बड़ी निष्ठा के साथ वह इसे मानकर चलती है; फिर भी, उसका यह जवाब! कुशारी महाशय के विषय में मैं ज्यादा कुछ नहीं जानता, पर बाहर से उन्हें जितना देखा है उससे मालूम हुआ है कि वे आचार-परायण ब्राह्मण हैं। और यह भी निश्चित है कि राजलक्ष्मी के इतिहास से वे वाकिफ नहीं हैं, उन्होंने तो सिर्फ मालिक समझकर ही निमन्त्रण किया है। परन्तु, राजलक्ष्मी आज वहाँ जाकर कैसे क्या करेगी, मेरी कुछ समझ में ही न आया। और मेरे प्रश्न को समझकर भी उसने जब कुछ नहीं कहा, तब भीतर के संकोच ने मुझे भी निर्वाक् कर दिया। यथासमय गो-यान आ पहुँचा। मैं तैयार होकर बाहर आया तो देखा कि राजलक्ष्मी गाड़ी के पास खड़ी है।”

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