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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“मगर भेजी कहाँ जा रही हैं? और उसकी वजह भी तो मालूम हो?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “वजह? आदमी खाएँगे, और जा रही हैं ब्राह्मण के घर।”

मैंने कहा, “वह ब्राह्मण है कौन?”

राजलक्ष्मी मुसकराती हुई कुछ देर चुप रही, शायद सोचने लगी कि नाम बताऊँ या नहीं। फिर बोली, “देकर कहना नहीं चाहिए, पुण्य घट जाता है। जाओ, तुम हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल आओ- तुम्हारी चाय तैयार है।”

मैं, फिर कोई प्रश्न बिना किये ही, बाहर चला गया।

लगभग दस बजे होंगे। बाहर के कमरे में तख्त पर बैठा, कोई काम न होने से, एक पुराने साप्ताहिक पत्र का विज्ञापन पढ़ रहा था। इतने में एक अपरिचित कण्ठ-स्वर का सम्भाषण सुनकर मुँह उठाकर देखा तो आगन्तुक अपरिचित ही मालूम हुए। वे बोले, “नमस्कार बाबूजी।”

मैंने हाथ उठाकर प्रति-नमस्कार किया और कहा, “बैठिए।”

ब्राह्मण का अत्यन्त दीन वेश था, पैरों में जूता नदारद, बदन पर कुरता तक नहीं, सिर्फ एक मैली चादर-सी पड़ी थी। धोती भी वैसी ही मलिन थी, ऊपर से दो-तीन जगह गाँठें बँधी हुईं। गँवई-गाँव के भद्र पुरुष के आच्छादन की दीनता कोई आश्चर्य की वस्तु नहीं है, और सिर्फ उसी पर से उसकी गार्हस्थिक अवस्था का अनुमान नहीं किया जा सकता। खैर, वे सामने बाँस के मूढ़े पर बैठ गये और बोले, “मैं आपकी एक गरीब प्रजा हूँ- इसके पहले ही मुझे आना चाहिए था, बड़ी गलती हो गयी।”

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