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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


काली ने बिना किसी डर के जमीन दिखाकर कहा, “यहाँ। ये क्या बचने वाले हैं?”

उसके चेहरे की तरफ देखने में मालूम हुआ कि ऐसा निर्विकल्प प्रेम संसार में सुदुर्लभ है। मन-ही-मन बोला, तुम भक्ति की पात्र हो। तुम्हारी बातें सुन लेने पर फिर 'मोह-मुद्गर' पढ़ने की जरूरत नहीं रहती। परन्तु मेरी वैसी विज्ञानमय अवस्था नहीं है। अभी तो यह जिन्दा है, इसलिए कुछ तो बिछाने को चाहिए ही।

मैंने पूछा, “बाबू के पहिनने के एक-आध धोती-ओती भी नहीं है क्या?”

काली ने सिर हिला दिया। उसमें किसी तरह की दुबिधा या संकोच का भाव न था। वह 'शायद' नहीं कहती थी। बोली, “धोती नहीं है, पतलून है।”

माना कि पैण्ट साहबी चीज है, कीमती वस्तु है; पर उससे बिस्तर का काम लिया जा सकता है या नहीं, मेरी समझ में न आया। सहसा याद आया, आते वक्त नजदीक ही कहीं एक फटा तिरपाल देखा था; मैंने कहा, “चलो चलें, दोनों मिलकर उस तिरपाल को उठा लावें। पतलून बिछाने की बजाय वह अच्छा रहेगा।”

काली राजी हो गयी। सौभाग्यवश वह वहीं पड़ा था, लाकर उसी पर सतीश को सुला दिया। उसी के एक किनारे पर काली ने अत्यन्त विनय के साथ आसन जमा लिया, और देखते-देखते ही वह वहीं सो गयी। मेरी धारणा थी कि स्त्रियों की नाक नहीं बजती पर काली ने उसे गलत साबित कर दिया।

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