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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


आनन्द ने कहा, “आप पहले से कुछ लुटे-लुटे से दिखाई देते हैं, भाई साहब?”

इसका जवाब दिया चक्रवर्ती ने। दो दिन से मुझे आहार नहीं मिला, सोने का कोई ठिकाना नहीं रहा, और किसी बड़े पुण्य से मैं जिन्दा आ गया हूँ तथा कुलियों में महामारी आदि का ऐसा सुन्दर और सविस्तार वर्णन किया कि सुनकर मैं भी दंग रह गया।

आनन्द ने कोई खास व्याकुलता प्रकट नहीं की। जरा कुछ मुसकराकर औरों के कान बचाकर कहा, “दो दिन में इतना नहीं होता भाई साहब, इसके लिए जरा कुछ समय चाहिए। क्या हुआ था? बुखार?”

मैंने कहा, “ताज्जुब नहीं। मलेरिया तो है ही।”

चक्रवर्ती ने आतिथ्य में कोई त्रुटि नहीं की, खाना-पीना आज खूब अच्छी तरह ही हुआ।

भोजन के बाद चलने की तैयारी करने पर आनन्द ने पूछा, “आप अचानक कुलियों में कैसे पहुँच गये?”

मैंने कहा, “दैव के चक्कर से।”

आनन्द ने हँसते हुए कहा, “चक्कर तो है ही। गुस्से में आकर घर पर खबर भी न दी होगी शायद?”

मैंने कहा, “नहीं- मगर वह गुस्से में आकर नहीं। देना फिजूल है, समझकर ही नहीं दी। इसके सिवा आदमी ही कहाँ थे जो भेजता?”

आनन्द ने कहा, “यह एक बात जरूर है। परन्तु आपकी भलाई-बुराई जीजी के लिए फिजूल कब से हो उठी? वे शायद डर और फिक्र से अधमरी हो गयी होंगी।”

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