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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“तो तू आया क्यों रे?”

“मामा ने कहा कि बाबू को पहुँचा दे। ऐसे सीधा जाकर पूरब को मुड़ जाने से ही गंगामाटी में जा पड़ेगा। जायेगा और चला आयेगा।”

सामने अंधेरी रात है, और अब ज्यादा देर भी नहीं है। अब तक तो आँखें मींचकर अपनी चिन्ता में ही मग्न था। पर लड़के की बातों से अब मुझे डर-सा मालूम होने लगा। मैंने कहा, “ऐसे सीधे दक्षिण की बजाय उत्तर को जाकर पश्चिम को तो नहीं मुड़ गया रे?”

लड़के ने कहा, “सो मैं क्या जानूँ?”

मैंने कहा, “नहीं जानता तो चल दोनों जने अंधेरे में मौत के घर चले चलें। अभागा कहीं का, रास्ता नहीं जानता था तो आया ही क्यों तू? तेरा बाप है?”

“नहीं।”

“माँ है?”

“नहीं, मर गयी।”

“आफत चुकी। चल, तो फिर आज रात को उन्हीं के पास चला चल। तेरे मामा में अकेली अकल ही ज्यादा नहीं, दया-माया भी काफी है।”

और कुछ आगे बढ़ने के बाद लड़का रोने लगा, उसने जता दिया कि अब वह आगे नहीं जा सकता।

मैंने पूछा, “फिर ठहरेगा कहाँ?”

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