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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
पास ही एक चौकी पर बैठ गया। उनके प्रश्न का ठीक उत्तर न देकर पूछ बैठा, “यहाँ बंकू बाबू हैं?”
“हैं क्यों नहीं।”
यह कहकर उन्होंने एक नये नौकर को कहा कि बंकू बाबू को बुला दे।
बंकू ने आकर देखा तो पहले वह बहुत विस्मित हुआ। बाद में मुझे अपनी बैठक में ले जाकर और बिठाकर बोला, “हम लोग तो समझते थे कि आप बर्मा चले गये।”
इस 'हम लोग' का क्या मतलब है, यह मैं पूछ नहीं सका। बंकू ने कहा, “आपका सामान अभी गाड़ी पर ही है क्या?”
“नहीं, मैं साथ में कोई सामान नहीं लाया।”
“नहीं लाये? तो क्या रात की ही गाड़ी से लौट जाना है?”
मैंने कहा, “सम्भव हुआ तो ऐसा ही विचार करके आया हूँ।”
बंकू बोला, “तब ठीक है, इतने थोड़े वक्त के लिए सामान की क्या जरूरत!”
नौकर आकर धोती, गमछा और हाथ-मुँह धोने को पानी आदि जरूरी चीजें दे गया; पर, और कोई मेरे पास नहीं आया।
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