लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास

15

अब तक का मेरा जीवन एक उपग्रह की तरह ही बीता, जिसको केन्द्र बनाकर घूमता रहा हूँ उसके निकट तक न तो मिला पहुँचने का अधिकार और न मिली दूर जाने की अनुमति। अधीन नहीं हूँ, लेकिन अपने को स्वाधीन कहने की शक्ति भी मुझमें नहीं। काशी से लौटती हुई ट्रेन में बैठा हुआ बार-बार यही सोच रहा था। सोच रहा था कि मेरी ही किस्मत में बार-बार यह क्यों घटित होता है? मरते दम तक अपना कहने लायक क्या किसी को भी न पा सकूँगा? क्या इसी तरह जिन्दगी काट दूँगा? बचपन की याद आई। दूसरे की इच्छा से दूसरे के घर में वर्ष के बाद वर्ष रहकर इस शरीर को तो किशोर से यौवन की ओर आगे बढ़ाता रहा, लेकिन, मन को न जाने किस रसातल की ओर खदेड़ता रहा। आज बार-बार पुकारने पर भी उस बिदा हुए मन की कोई आहट नहीं मिलती, हालाँकि कभी-कभी क्षीण कण्ठ का अनुसरण कान में आ लगता है, फिर भी, बि‍‍ना संशय के नहीं पहिचान पाता कि वह अपना ही है,- विश्वास करते डर लगता है।

यह समझकर ही यहाँ आया हूँ कि आज मेरे जीवन में राजलक्ष्मी मृत है। नदी-किनारे खड़े होकर विसर्जित प्रतिमा के अन्तिम चिह्न तक को अपनी आँखों से देखकर लौटा हूँ- आशा करने का, कल्पना करने का, अपने को धोखा देने का कोई भी सूत्र शेष रखकर नहीं आया हूँ। उस तरफ सब शेष हो गया है, निश्चिन्त हो गया हूँ, पर यह शेष कितना शेष है, यह किससे कहूँ और कहूँ ही क्यों?

पर कुछ दिन का ही तो जिक्र है। कुमार साहब के साथ शिकार खेलने गया। दैवात् पियारी का गाना सुनने के लिए बैठा, बैठते ही भाग्य में कुछ ऐसा मिला जो जितना आकस्मिक था उतना ही अपरिसीम। न अपने गुण से पाया और न अपनी गलती से खोया ही, फिर भी आज स्वीकार करना पड़ा कि मैंने उससे खो दिया- मेरे संसार में सब मिलाकर क्षति ही शेष रही। जा रहा हूँ कलकत्ते, पर वासना फिर एक दिन बर्मा पहुँचायगी। लेकिन यह मानों जुआरी का घर लौटना है। घर का चित्र अस्पष्ट, अप्रकृत है, सिर्फ पथ ही सत्य है। ऐसा लगता है मानों इस पथ पर चलने का कोई अन्त नहीं।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book