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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
गौहर का एक परिचय और है कि वह कवि है। उन दिनों वह मुँह-जुबानी अनर्गल ग्राम-गीत बना सकता था- किसी भी वक्त और किसी भी विषय पर। छन्द, मात्रा और ध्वनि इत्यादि काव्य-शास्त्र के कानून-कायदों को मानता था या नहीं, इसका ज्ञान मुझे न तब था और न अब है। पर मुझे याद है कि मैं उन दिनों मणिपुर का युद्ध और टिकेन्द्र जीत सिंह के वीरत्व की कहानी उसके मुँह से सुनकर पुन:-पुन: उत्तेजित हो उठता था। पूछा, “गौहर, उन दिनों तुम्हें कृत्तिवास से भी सुन्दर रामायण लिखने का शौक था, वह संकल्प अब भी है या गया है?” गौहर क्षण-भर में गम्भीर हो गया। बोला, “वह शौक क्या कभी जा सकता है रे? उसी के बल पर तो बचा हुआ हूँ। जब तक जिन्दा रहूँगा तब तक उसे लिये रहूँगा। कितना लिखा है, चलो न, आज सारी रात तुम्हें सुनाऊँगा तो भी खत्म न होगा।”
“कहते क्या हो गौहर?”
“नहीं तो क्या तुमसे झूठ कहता हूँ?”
प्रदीप्त कवि-प्रतिभा से उसकी आँखें और मुँह चमक उठे। सन्देह नहीं किया था, सिर्फ विस्मय जाहिर किया था। तथापि, कहीं केंचुआ खोजते हुए साँप न निकल आये- मुझे जबरदस्ती बैठाकर सारी रात काव्य-चर्चा ही न करता रहे- मेरे भय की सीमा नहीं रही।
खुश करने के लिए कहा, “नहीं गौहर, यह थोड़े ही कहता हूँ। तुम्हारी अद्भुत शक्ति को सभी स्वीकार करते हैं, पर बचपन की बातें याद हैं या नहीं, यही जानने के लिए पूछा है। तो ठीक - वह बंगाल की एक कीर्ति होकर रहेगी।”
“कीर्ति? अपने मुँह से क्या कहूँ भाई, पहले सुन तो लो, फिर ये सब बातें होंगी।”
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