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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“नहीं। देखो न, रास्ता नहीं है।”

यह सही है। दक्षिण बाँयीं ओर काँटेदार पेड़ और बेत-कुंजकी घनी तथा सम्मिलित शाखा-प्रशाखाओं के कारण गाँव की वह गली अतिशय संकीर्ण हो गयी है। गाड़ी को अन्दर घुसाने का तो प्रश्न ही अवैध था, क्योंकि अगर आदमी भी होशियारी के साथ झुककर न घुसे तो काँटों में फँसकर उसके कपड़ों का फटना अनिवार्य है- अतएव, कवि के कथनानुसार वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य अनिर्वचनीय था। उसने बैग को कन्धों पर रखा और मैंने बिछौने को बगल में दबाया। इस तरह हम लोग गोधूलि की बेला में गाड़ी से उतरे। कवि-गृह में जब पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। अन्दाज लगाया कि आकाश में वसन्त-रात्रि का चन्द्रमा भी निकल आया है। शायद पूर्णिमा के आस-पास की तिथि थी, अतएव इस आशा में था कि गम्भीर निशीथ में चन्द्रदेव सिर के ऊपर आ जाँय तो तिथि के बारे में नि:संशय हो जाऊँ। मकान के चारों ओर बाँसों का घना वन है। बहुत सम्भव है कि इसी जंगल में उसका कोयल नीलकण्ठ और बुलबुलों का झुण्ठ रहता हो और उन्हीं की अहर्निश पुकार तथा गाना कवि को व्याकुल बना देता हो। बाँस के पके सूखे हुए असंख्य पत्तों ने झड़झड़ कर आँगन और चबूतरे को चारों ओर से परिव्याप्त कर रखा है। इन पर नज़र पड़ते ही इस प्रेरणा से सारा मन क्षणभर में ही गर्जना कर उठता है कि झड़े हुए पत्तों का गीत गाया जाय। नौकर ने आकर बाहर की बैठक खोल दी और बत्ती जला दी। गौहर ने तख्त दिखाते हुए कहा, “तुम इसी कमरे में रहो। देखना, कैसी सुन्दर हवा आती है।”

असम्भव नहीं है। देखा, कि दक्षिण की हवा की वजह से देशभर की सूखी हुई लताओं और पत्तों ने गवाक्ष-पथ से भीतर घुसकर कमरे को भर दिया है, तख्त को भी छा दिया है। फर्श पर पैर पड़ते ही शरीर सनसना उठा। खाट के पाये के पास चूहे ने अपना बिल बनाकर मिट्टी जमा कर रक्खी है। मैंने उसे दिखाकर कहा, “गौहर, कमरे में तुम लोग क्या कभी झाँकते भी नहीं?”

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