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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


गौहर ने गम्भीर होकर कहा, “किन्तु मैं उनकी भाषा वाकई समझता हूँ। वे सचमुच बोलते हैं- क्या तुम लोग विश्वास नहीं करते?”

मैंने कहा, “यह तो तुम भी समझते हो कि विश्वास करना मुश्किल है?”

गौहर ने सरलता से स्वीकार कर लिया, कहा, “हाँ, हाँ, यह तो समझता हूँ।”

एक दिन सुबह अपनी रामायण का अशोक-वन वाला अध्याय कुछ देर तक पढ़ने के बाद उसने हठात् किताब बन्द कर दी और मेरी ओर घूमकर प्रश्न किया, “अच्छा श्रीकान्त, तुमने कभी किसी को प्यार किया है?”

कल बहुत रात तक जागकर राजलक्ष्मी को शायद अपनी अन्तिम चिट्टी लिखी थी। उसमें बाबा की बातें, पूँटू की कथा और उसके दुर्भाग्य का समस्त विवरण था। उन लोगों को वचन दिया था कि एक आदमी की अनुमति माँग लूँगा - सो वह भिक्षा भी उसमें माँगी थी। चिट्ठी भेजी नहीं थी, उस वक्त पॉकेट में ही पड़ी हुई थी। गौहर के प्रश्न के उत्तर में हँसकर कहा, “नहीं।”

गौहर ने कहा, “यदि कभी प्यार करो, यदि कभी ऐसा दिन आये तो मुझे जताना श्रीकान्त।”

“जानकर क्या करोगे?”

“कुछ भी नहीं। तब सिर्फ तुम लोगों के बीच जाकर कुछ दिन काट आऊँगा।”

“अच्छा।”

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