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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
बात अब भी साफ न हुई, पर एक धुँधली छाया आँखों के सामने तैर गयीं। वह फिर कहने लगा, “आपने तो खुद अपनी आँखों से देखा है कि महीने में कम-से-कम दो दफा मेरी नौकरी छूट जाती है। हालत बुरी नहीं है, नाराज होकर जा भी सकता हूँ, लेकिन क्यों नहीं जाता? जा नहीं सकता। इतना जानता हूँ कि जिसकी दया से सब कुछ हुआ है, उसके एक नि:श्वास से ही आश्विन के मेघ की तरह सब लोप हो जायेगा, वह पलक मारने की भी फुर्सत नहीं देगा। यह माँ की नाराजगी नहीं है, यह तो मेरे देवता का आशीर्वाद है।”
यहाँ पाठकों को यह स्मरण करा देना आवश्यक है कि बचपन में रतन थोड़े दिनों तक प्राइमरी स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर चुका है।
कुछ रुककर कहा, “माँ ने मना कर दिया है, इसीलिए कभी कहता नहीं। घर में जो कुछ था बाबा ने ले लिया, यजमानों का एक घर तक नहीं दिया। एक छोटा लड़का और लड़की, और उनकी माँ को छोड़कर पेट के लिए एक दिन गाँव छोड़कर बाहर निकल पड़ा। पर पहले जन्म की तपस्या थी, मेरी नौकरी इन माँ के ही घर लग गयी। सारा दुखड़ा उन्होंने सुना, लेकिन उस वक्त कुछ नहीं कहा। एक वर्ष के बाद मैंने निवेदन किया, “माँ, बच्चों को देखने की इच्छा है, अगर कुछ दिनों की छुट्टी मिल जाती। हँसकर बोलीं, “फिर आओगे न?” जाने के दिन हाथ में एक पोटली देते हुए कहा, “रतन, बाबा से लड़ाई-झगड़ा मत करना भैया, जो कुछ तुम्हारा चला गया है उसे इसके द्वारा फेर लेना।” गठरी खोलकर देखता हूँ तो पाँच-सौ रुपये हैं! पहले तो अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। ऐसा लगा, मानो मैं जागृत अवस्था में स्वप्न देख रहा हूँ। मेरी उसी माँ से बंकू बाबू अब उलटी-सीधी बातें कहते हैं, आड़ में खड़े होकर फुस-फुस करते हैं, सोचता हूँ कि अब इनके ज्यादा दिन नहीं हैं, क्योंकि अब माँ-लक्ष्मी जाने ही वाली हैं!”
मैंने यह आशंका नहीं की थी, चुपचाप सुनने लगा।
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