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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
दो बड़ी खबरें मिलीं। एक तो यह कि बंकू अब बड़ा हो गया है। पटने में जब पहली बार मैंने उसे देखा था तो उस वक्त उसकी उम्र सोलह-सतरह थी। अब इक्कीस वर्ष का युवक है। बल्कि इन पाँच-छह वर्षों में पढ़-लिखकर वह आदमी बन गया है। अत: शैशव का वह सकृतज्ञ स्नेह यदि आज यौवन के आत्मसम्मान-बोध में सामंजस्य न रख पाता हो, तो इसमें विस्मय की कौन-सी बात है?
दूसरी खबर राजलक्ष्मी की गम्भीर वेदना का पता न तो बंकू को और न गुरुदेव को ही आज तक मिला है।
मेरे मन में ये ही दो बातें बहुत देर तक घूमती रहीं।
बड़े यत्न से अंकित चमड़े की सील-मोहर को देखकर चिट्ठी खोली। उसके हाथ की लिखावट ज्यादा देखने का मौका नहीं मिला है, पर, यह खयाल आया कि अक्षर ऐसे तो नहीं हैं कि पढ़ने में तकलीफ हो, लेकिन फिर भी अच्छे नहीं हैं। पर यह पत्र उसने बहुत सावधानी से लिखा है। शायद उसे डर था कि मैं चिढ़कर फेंक न दूँ, बल्कि शुरू से आखिर तक सब कुछ आसानी से पढ़ जा सकूँ।
आचार और आचरण में राजलक्ष्मी उस युग की प्राणी है। प्रणय-निवेदन की अधिकता तो दूर की बात है, बल्कि यह भी याद नहीं आता कि उसने मेरे सामने कभी कहा हो कि 'प्रेम करती हूँ।' उसने चिट्ठी लिखी है- मेरी प्रार्थना के अनुकूल अनुमति देकर। तो भी, न जाने क्या है, पढ़ने में जाने क्यों डर लगने लगा। उसके बाल्य-काल की याद आ गयी। उस दिन गुरुमहाशय की पाठशाला में उसका पढ़ना-लिखना बन्द हो गया था। बाद में शायद घर पर ही थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लिया होगा। अतएव, भाषा का इन्द्रजाल, शब्दों की झनकार, पद-विन्यास की मधुरता की उसके पत्र में आशा करना अन्याय है। कुछ मामूली प्रचलित बातों में ही मन के भाव व्यक्त करने के अलावा वह और क्या करेगी? अनुमति देकर मामूली शुभ-कामना की दो लाइनें होंगी- यही तो? पर लिफाफा खोलकर पढ़ना शुरू करते ही कुछ देर के लिए बाहर का और कुछ भी याद न रहा। पत्र लम्बा नहीं है, लेकिन भाषा और भंगी जितनी सरल और सहज समझी थी, उतनी नहीं है। मेरे आवेदन का उत्तर उसने इस तरह दिया है-
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