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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


नया हुक्का खरीदकर रतन सयत्न चिलम सजाकर दे गया। थोड़ी देर तक गौर से देखने के बाद बाबा ने कहा, “ऐसा लगता है कि इस आदमी को कहीं देखा है?”

रतन ने फौरन ही कहा, “जी हाँ, देखा क्यों नहीं है। देश के मकान में जब बाबू बीमार थे...”

“ओ, तभी तो कहा कि पहिचाना हुआ चेहरा है।”

“जी हाँ।” कहकर रतन चला गया।

बाबा का मुँह अत्यन्त गम्भीर हो गया। धूर्त्त आदमी ठहरे, शायद उन्हें सारी बातें याद आ गयीं। चुपचाप चिलम के दम लगाते हुए बोले, “आने के लिए दिन देखकर आया था। बहुत अच्छा दिन है। मेरी इच्छा है कि आशीर्वाद का काम ऐसे ही खत्म कर जाऊँ। नूतन बाजार में तो सभी चीजें बिकती हैं। नौकर को एक बार भेज नहीं सकते? क्या कहते हो?”

जब कुछ भी कहने को न मिला तो किसी तरह सिर्फ कह दिया, “नहीं।”

“नहीं? नहीं क्यों? बारह बजे तक दिन बहुत अच्छा है। पंचांग है?”

मैंने कहा, “पंचांग की जरूरत नहीं। मैं विवाह नहीं कर सकता।”

बाबा ने हुक्के को दीवार से लगाकर रख दिया। चेहरा देखकर मैं ताड़ गया कि वह युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। गले को बहुत शान्त और गम्भीर बनाकर कहा, “सारा आयोजन एक तरह से पूरा हो गया है। लड़की के ब्याह की बात है, हँसी-मजाक का मामला तो है नहीं। बचन दे आने पर अब ना करने पर कैसे काम चलेगा?”

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