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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
रतन ने ठीक इसी बात का अन्दाज लगाया। कहा, “बाबू, अगर आप नाराज़ न हों तो एक बात कहूँ।”
“क्या बात रतन?”
रतन ने कुछ संकोच के साथ कहा, “ढाई हजार रुपये तो कम रकम नहीं है बाबू, वे कौन होते हैं जिनकी शादी के लिए आपने इतना रुपया खामख्वाह देने को कहा है? इसके अलावा वह बूढ़ा बाबा हो या और कोई, लेकिन अच्छा आदमी नहीं है। उसे देने कहना अच्छा नहीं हुआ बाबू।”
उसका मन्तव्य सुनकर जैसे अनिर्वचनीय आनन्द मिला वैसे ही मन को जोर भी मिला और यही मैं चाहता था। तथापि, अपनी आवाज में किंचित् सन्देह का आभास देकर बोला, “कहना ठीक नहीं हुआ- क्यों रतन?”
रतन बोला, “हाँ बाबू, निश्चय ठीक नहीं हुआ। रुपये भी तो कम नहीं हैं, और फिर किसलिए, कहिए तो?”
“ठीक तो है।” मैंने कहा, “तो नहीं देंगे।”
आश्चर्य से थोड़ी देर तक देखने के बाद रतन ने कहा, “वह छोड़ेगा क्यों?”
मैंने कहा, “नहीं छोड़ेगा तो क्या करेगा? लिखकर तो दिया ही नहीं है और फिर, यही कौन जानता है कि उस वक्त मैं यहाँ रहूँगा या बर्मा चला जाऊँगा?”
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