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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


चकित होकर पूछा, “पर तुम्हारे बाबू तो मुसलमान हैं। वैष्णव-वैरागी अपने आश्रम में उन्हें रहने कैसे देंगे?”

नवीन ने नाराज होकर कहा, “इन सब बाउल संन्यासियों को क्या धर्माधर्म का ज्ञान है? ये जाति-जन्म कुछ भी नहीं मानते। जो भी कोई उन्हें मिलता है, वे उसे ही अपने दल में खींच लेते हैं, सोच-विचार कुछ नहीं करते।”

पूछा, “पर उस बार जब मैं तुम्हारे यहाँ छह-सात दिन था, तब तो गौहर ने उनके बारे में कुछ नहीं कहा?”

नवीन बोला, “कहते तो कमललता के गुण-अवगुण जाहिर नहीं हो जाते? सिर्फ उन कई दिनों ही बाबू अखाड़े के पास नहीं गये। पर जैसे ही आप गये वैसे ही कॉपी और कलम लिए बाबू अखाड़े अखाड़े में जा धमके।”

प्रश्न करने पर मालूम हुआ कि द्वारिका बाउल गाना गाने और दोहे बनाने में सिद्धहस्त है। गौहर इस प्रलोभन में फँस गया। उसको कविता सुनाता है, उससे अपनी गलतियों का संशोधन करा लेता है और कमललता एक युवती वैष्णवी है- उसी आश्रम में रहती है। वह देखने में अच्छी है, गाना अच्छा गाती है। उसकी बातें सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं। कभी-कभी वैष्णवों की सेवा के लिए गौहर रूपये-पैसे भी देता है। अखाड़े की पुरानी दीवार जीर्ण होकर गिर गयी थी, गौहर ने अपने खर्चे से उसकी मरम्मत करा दी है। यह काम उसने उस सम्प्रदाय के लोगों के अगोचर चुपचाप ही किया है।

मुझे याद आया कि बचपन में इस अखाड़े के बारे में बातें सुनी थीं। पुराने जमाने में महाप्रभु के एक भक्त शिष्य ने इस अखाड़े की प्रतिष्ठा की थी। तब से शिष्य-परम्परा के अनुसार वैष्णव इसमें वास करते आ रहे हैं। अत्यन्त कुतूहल पैदा हुआ। कहा, “नवीन, मुझे एक बार अखाड़ा दिखा सकोगे?”

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