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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “कमललता देखने ही तो आया हूँ गुसाईं, वह कहाँ है?”
बाबाजी बहुत खुश हुए। बोले, “उसे देखोगे? पर गुसाईं, तुम उससे अपरिचित नहीं हो, वृन्दावन में उसे अनेक बार देखा है। शायद भूल गये हो, पर देखते ही पहिचान जाओगे कि वह कमललता है। गुसाईं, उसे एक बार पुकारो न!” कहकर बाबाजी ने गौहर को पुकारने का इशारा किया। इनके निकट सब 'गुसाईं' हैं। बोले, “कहो कि श्रीकान्त तुम्हें देखने आया है।”
गौहर के चले जाने के बाद पूछा, “गुसाईं, मेरे बारे में सारी बातें शायद गौहर ने तुम्हें बताई हैं?”
बाबाजी ने सिर हिलाकर कहा, “हाँ, सब बताया है। जब उससे पूछा कि 'गुसाईं, तुम छह-सात दिन क्यों नहीं आये? तो उसने कहा कि श्रीकान्त आये थे।” यह भी उसने कहा कि 'तुम फिर जल्दी ही आओगे।” यह भी मालूम हुआ कि तुम बर्मा जाने वाले हो।”
सुनकर सन्तोष की साँस छोड़कर मन ही मन मैंने कहा, रक्षा हुई। डर था कि वास्तव में किसी अलौकिक आध्यात्मिक शक्ति-बल के कारण तो ये मुझे देखते ही नहीं पहिचान गये हैं। कुछ भी हो, यह मानना ही पड़ेगा कि मेरे बारे में इस क्षेत्र में उनका अन्दाज गलत नहीं है।
बाबाजी अच्छे ही जान पड़े। कम-से-कम असाधु प्रकृति के नहीं मालूम हुए। बहुत सरल। यह बाबाजी ने सरलता से स्वीकार कर लिया कि न जाने क्यों गौहर ने मेरी सब बातें- अर्थात् जितना वह जानता है, इन लोगों से कह दी हैं। कविता और वैष्णव-रस-चर्चा में वे कुछ-कुछ सनकी-से-कुछ विभ्रान्त से मालूम हुए।
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