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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


एक ओर एक छोटे से तख्त पर बिछौना बिछा है। निकट ही एक चौकी पर कुछ किताबें और एक थाली में बकुल-फूल रखे हैं। अभी-अभी कोई प्रदीप जलाकर शायद धूप जला गया है, कमरा अब भी उसकी गन्ध और धुएँ से भरा हुआ था- बहुत अच्छा लगा। दिनभर की क्लान्ति तो थी ही- ठाकुर-देवताओं से हमेशा दूर-दूर रहता आया हूँ; उधर आकर्षण नहीं था- अत: कपड़े उतार कर धप से बिछौने पर लेट गया। जाने यह किसका कमरा है, एक रात के लिए वैष्णवी ने जाने किसकी शय्या मुझे उधार दे गयी है- अथवा शायद यह उसी की है- इन सब विचारों से मेरा मन स्वभावत: ही बहुत संकोच अनुभव करता है। पर आज कुछ भी खयाल न हुआ, मानो न जाने कब से परिचित अपने ही आदमियों के पास आ पहुँचा हूँ। शायद कुछ तन्द्रा आ गयी थी कि इतने में ही जैसे किसी ने दरवाजे के बाहर से आवाज दी, “नये गुसाईं, मन्दिर नहीं जाओगे? वे तुम्हें बुला जो रहे हैं।”

चटपट उठ बैठा। मंजीरे के साथ-साथ कीर्तन के गाने की आवाज भी कानों में पहुँची। बहुत से आदमियों का समवेत कोलाहल ही नहीं था; गेय वस्तु भी जितनी मधुर थी उतनी ही स्पष्ट थी। स्त्री का कण्ठ था- बिना आँखों से देखे ही निस्सन्देह अनुमान किया कि कमललता है। नवीन का विश्वास है कि इस मीठे स्वर ने ही उसके मालिक को फाँस लिया है। सोचा कि यह असम्भव नहीं है और बहुत असंगत भी नहीं है।

मन्दिर में घुसकर एक ओर चुपचाप बैठ गया, किसी ने फिरकर नहीं देखा। सबकी दृष्टि राधा-कृष्ण की युगल-मूर्ति पर लगी थी। बीच में खड़ी हुई कमललता कीर्तन कर रही है-

मदन गोपाल जय जय यशोदा के लाल की,
यशोदा के लाल जय जय, जय नन्दलाल की।
नन्दलाल जय जय गिरिधारी लाल की,
गिरिधारी लाल जय जय गोविन्द-गोपाल की ॥

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