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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


पता नहीं कि कितनी देर से सो रहा था। कान में भनक पड़ी, “अरे नये गुसाईं?”

जगकर उठ बैठा, “कौन?”

“मैं हूँ तुम्हारी शाम की बन्धु- इतना सोते हो?”

अंधेरे कमरे में चौखट के पास कमललता वैष्णवी खड़ी थी। बोला, “जागने से क्या फायदा होता? सोने में समय का कुछ सदुपयोग तो हुआ।”

“यह मालूम है। पर ठाकुर का प्रसाद नहीं लोगे?”

“लूँगा।”

“तो फिर, सो क्यों रहे हो?”

“जानता हूँ कि कोई दिक्कत नहीं होगी, प्रसाद तो मिलेगा ही। मेरा शाम का बन्धु रात को भी परित्याग नहीं करेगा।”

वैष्णवी ने सहास्य कहा, “यह अधिकार वैष्णवों को है, तुम लोगों को नहीं।”

“आशा मिलने पर वैष्णव होते क्या देर लगती है? तुमने गौहर तक को गुसाईं बना डाला, तो मैं ही क्या इतनी अवहेलना का पात्र हूँ? आज्ञा होने पर वैष्णवों का दासानुदास होने को भी राजी हूँ।”

कमललता का कण्ठ स्वर कुछ गम्भीर हुआ। कहा, “वैष्णवों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, गुसाईं, अपराध होता है। गौहर गुसाईं को भी तुमने गलत समझा है। उनके अपने आदमी उन्हें काफिर कहते हैं, पर नहीं जानते कि वे पक्के मुसलमान हैं, पिता-पितामह के धर्म-विश्वास को इन्होंने नहीं त्यागा है।”

“पर उसका भाव देखने पर तो यह मालूम नहीं होता।”

वैष्णवी ने कहा, “यही तो आश्चर्य है। पर अब देरी मत करो, आओ।” फिर कुछ सोचकर कहा, “या प्रसाद ही तुम्हें यहीं दे जाऊँ- क्या कहते हो?”

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