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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


तर्क की दृष्टि से ये बातें स्पष्ट भी नहीं और पूर्ण भी नहीं हैं। पर यह और कुछ तो है नहीं, यह तो उसका जीवन्त विश्वास है। उसके इस जोर और अकपट उक्ति के सामने मैं एकाएक न जाने कैसे सिटपिटा-सा गया, बहस करने- प्रतिवाद करने का साहस ही नहीं हुआ, इच्छा भी नहीं हुई। बल्कि सोचा, सच तो है, पत्थर हो या और कुछ लेकिन इतने परिपूर्ण विश्वास से वह अपने को अगर पूर्णत: समर्पित न कर पाती तो वर्ष के बाद वर्ष, और दिन के बाद दिन यह अविछिन्न सेवा करते रहने की शक्ति उसे मिलती कैसे? इस तरह सीधे, निश्चिन्त और निर्भय होकर खड़े होने का अवलम्बन कहाँ से मिलता? ये शिशु तो हैं नहीं, बच्चों के खेल के इस मिथ्या अभिनय से दुबिधाग्रस्त मन दो दिन में ही थककर गिर जाता? पर ऐसा तो नहीं हुआ बल्कि भक्ति और प्रेम की अखण्ड एकाग्रता में इनके आत्मनिवेदन का आनन्दोत्सव बढ़ता ही जा रहा है। इस जीवन में पाने की दृष्टि से वह क्या सब कुछ शून्य या सब कुछ भूल है- सब अपने को ठगना है?

वैष्णव ने कहा, “क्यों गुसाईं, बात क्यों नहीं करते?”

मैंने कहा, “सोच रहा हूँ।”

“किसका सोच कर रहे हो?”

“तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ।”

“यह तो मेरा बड़ा सौभाग्य है।” कुछ देर बाद कहा, “फिर भी यहाँ रहना नहीं चाहते, न जाने कहाँ किस बर्मा देश में नौकरी करने जाना चाहते हो। नौकरी क्यों करोगे?”

मैंने कहा, “मेरे पास मठ की जमीन-जायदाद तो है नहीं- अन्धभक्तों का दल भी नहीं- खाऊँगा क्या?”

“भगवान देंगे।”

मैंने कहा, “यह अत्यन्त दुराशा है। पर ऐसा तो नहीं लगता कि तुम सबका भी भगवान पर बहुत भरोसा है, नहीं तो भिक्षा के लिए क्यों जातीं।”

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