लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


एकाएक वैष्णवी चकित हो उठी, “अरे वाह! तुम्हारे लिए चाय जो मँगाई है, गुसाईं ।”

“कहती क्या हो? कहाँ मिली?”

“आदमी को शहर भेजा था। जाऊँ, तैयार करके ले आऊँ, देखो, कहीं भाग न जाना।”

“नहीं, लेकिन बनाना जानती हो?”

वैष्णवी ने जवाब नहीं दिया, सिर्फ सिर हिलाकर हँसती हुई चली गयी। उसके चले जाने के बाद उस ओर देखने पर हृदय में न जाने कैसी एक चोट-सी लगी। चाय-पान आश्रम की व्यवस्था नहीं है, शायद मनाही है, तो भी उसे यह खबर लग गयी कि यह चीज मुझे अच्छी लगती है और शहर में आदमी भेजकर उसने मँगवा भी ली। उसके विगत जीवन का इतिहास नहीं जानता, और वर्तमान का भी नहीं। केवल यह आभास मिला है कि वह अच्छा नहीं है, वह निन्दा के योग्य है- सुनने पर लोगों को घृणा होती है। तथापि, वह उस कहानी को मुझसे छिपाना नहीं चाहती, सुनाने के लिए बार-बार जिद कर रही है, सिर्फ मैं ही सुनने को राजी नहीं हूँ। मुझे कुतूहल नहीं है, क्योंकि प्रयोजन नहीं है। प्रयोजन उसी का है। अकेले बैठे हुए इस प्रयोजन के सम्बन्ध में सोचते हुए स्पष्टत: देखा कि मुझे बताए वगैर उसके हृदय की ग्लानि नहीं मिटेगी- मन में वह किसी तरह भी बल नहीं पा रही है। सुना है कि मेरा 'श्रीकान्त' नाम कमललता उच्चारण नहीं कर सकती। पता नहीं कि कौन यह उसका परमपूज्य गुरुजन है और उसने कब इस लोक से बिदा ले ली है। हमारे नाम की इस दैवी एकता ने ही शायद इस विपत्ति की सृष्टि की है और उसने तब से ही कल्पना में गत जन्म के स्वप्न सागर में डुबकी लगाकर संसार की सब यथार्थताओं को तिलांजलि दे दी है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book