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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“हमारी कलकत्ते की पुरानी दासी बहुत-सी चीजें ले आयी। उसी ने मेरी परवरिश की थी, उसी के मुँह से दिन बढ़ जाने का कारण सुना।”

कितनी पुरानी बात है, तो भी गला भारी हो गया और उसकी आँखों में आँसू आ गये। मुँह फिराकर वैष्णवी आँसू पोंछने लगी।

पाँच-छह मिनट बाद पूछा, “उसने क्या कारण बताया?”

वैष्णवी ने कहा, “उसने बताया कि मन्मथ अचानक दस हजार के बदले बीस हजार रुपयों की माँग पेश कर बैठा। मुझे कुछ मालूम नहीं था, इसलिए चौंककर पूछा कि क्या मन्मथ रुपयों के बदले राजी हुआ है? और पिताजी भी बीस हजार रुपये देने को तैयार हैं? दासी ने कहा, उपाय क्या है दीदी रानी? मामला भी तो आसान नहीं है, जाहिर हो जाने पर जाति, कुल, मान-सब चला जायेगा। मन्मथ ने असली बात अन्त में जाहिर कर दी। कहा कि इसके लिए वह तो जिम्मेदार है नहीं, जिम्मेदार है उसका भतीजा यतीन। अत: यदि बिना दोष के उसे अपनी जाति छोड़नी ही है तो बीस हजार से कम में नहीं छोड़ सकता। फिर, दूसरे के लड़के का पितृत्व स्वीकार करना- यह भी तो कम मुश्किल नहीं है!

“यतीन अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, उसे बुलाकर बात सुनाई गयी। सुनकर पहले तो वह हक्का-बक्का-सा हुआ खड़ा रहा। फिर बोला, झूठी बात है। चाचा मन्मथ गरज उठा, “पाजी, नीच, नमकहराम! जो व्यक्ति तुझे खाना-कपड़ा और कॉलेज में पढ़ा-लिखाकर आदमी बना रहा है, उसी का तूने सर्वनाश किया! कैसे काले साँप को मैं मालिक के घर में लाया! सोचा था कि माँ-बाप-हीन लड़का आदमी बनेगा। छी, छी, यह कहने के साथ-ही-साथ वह छाती और सिर पीटने लगा। बोला, यह बात उषा ने खुद अपने मुँह से कही है और तुम इनकार करते हो!

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