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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैंने सिर हिलाकर कहा, “यह नहीं होगा कमललता, कल मैं चला जा रहा हूँ। पर जाने के पहले गौहर के बारे में जानने की इच्छा होती है।”

वैष्णवी ने सिर्फ नि:श्वास छोड़कर कहा, “गौहर के बारे में? नहीं, उसे सुनने का तुम्हारा काम नहीं। सचमुच ही कल जाओगे?”

“हाँ, सच ही कल जाऊँगा।”

क्षणभर के लिए स्तब्ध रहकर वैष्णवी ने कहा, “किन्तु इस आश्रम में यदि तुम फिर कभी आओगे गुसाईं, तो कमललता को न खोज पाओगे।”

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इस विषय में सन्देह न था कि अब यहाँ एक क्षण रहना भी उचित नहीं। पर उसी समय मानों कोई आड़ में खड़ा होकर आँख बन्द कर इशारे से निषेध करता है। कहता है, “जाओगे क्यों? यही सोचकर तो आये थे कि छह-सात दिन रहेंगे,- रहो न। तकलीफ तो कुछ है नहीं।”

रात को बिछौने पर लेटा हुआ सोच रहा था कि ये कौन हैं जो एक ही शरीर में वास करके एक ही वक्त ठीक उलटी राय देते हैं। किसकी बात ज्यादा सच है? कौन ज्यादा अपना है? विवेक, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति - ऐसे ही जाने कितने नाम हैं, इनकी न जाने कितनी दार्शनिक व्याख्याएँ हैं, पर सत्य को आज भी कौन नि:संशय प्रतिष्ठित कर सका है? जिसको सोचता हूँ, कि अच्छा है, इच्छा कर वहीं पर पैर बढ़ाने में बाधा क्यों डालती है? अपने ही अन्दर के इस विरोध- द्वन्द्व का शेष क्यों नहीं होता? मन कहता है कि मेरा चला जाना ही श्रेयस्कर है, चला जाना ही कल्याणकारी है। तो फिर दूसरे ही क्षण उस मन की दोनों आँखों में आँसू क्यों भर आते हैं? बुद्धि, विवेक, प्रवृत्ति, मन, इन सब बातों की सृष्टि करके सच्ची सांत्वना कहाँ रह जाती है?

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